न तस्य मायया च न रिपुरीशीत मर्त्यः । यो अग्नये ददाश हव्यदातये ॥ (सामवेद मंत्र १०४) जो मनुष्य देवों को हव्य पदार्थ देने के लिए, अग्नि के लिए आहुति सहित दान करता है, उसका शत्रु माया द्वारा भी शासन नहीं कर सकता। इस सामवेद मंत्र 104 में ईश्वर ने माया से छूटने का सरल परंतु...
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जो भी यज्ञ करता है उसको ईश्वर सारे सुख देता है। इसलिए ईश्वर ने यह प्रार्थना बनाई है कि हे मनुष्य! मुझसे रोज प्रार्थना करो कि – हे प्रभु! हमें यज्ञ की प्रेरणा दे। भगवान ने कहा कि यज्ञ से श्रेष्ठ कर और कुछ भी नहीं है। हर चीज से, हर पल से, बड़े ऊंचे ऊंचे पद के...
वेद निर्मल ईश्वर की वाणी है। यह लिखे भी नहीं भगवान ने और ना ही मुंह से बोल कर दिए हैं। क्योंकि भगवान तो निराकार है। अकाय है, उसके तो हाथ, पैर ,इंद्रियां होती ही नहीं है, तो वह बोल नहीं सकता। बोलते तो ऋषि मुनि है। जैसे हर सृष्टि के आरंभ में बिना लिखे, पढ़े, चारों...
पृथिवी पर हर समय एक यथार्थ वक्ता की आवश्यकता है। यथार्थ वक्ता का मतलब है कि जो जैसा है वैसा ही बोलना। इसमें प्रमाण यही है कि ईश्वर जैसा है वैसा ही बोलो। अपनी मर्जी से क्यों बोलते हो? वेदों में ईश्वर का जैसा वर्णन है वही बोलो। वह जो बोलेगा और जो वेदों को सुनेगा...