स्वामी राम स्वरूप जी, योगाचार्य, वेद मंदिर (योल) (www.vedmandir.com)

ओ३म् धीरा त्वस्य महिना जनूंषि वि यस्तस्तम्भ रोदसी चिदुर्वी । 

प्र नाकमृष्वं नुनुदे बृहन्तं द्विता नक्षत्रं पप्रथच्च भूम ॥ (ऋग्वेद ७/८६/१)

(यः) जो परमात्मा (वि) अच्छी तरह (रोदसी) द्युलोक (चित्) और (उर्वी) पृथिवी लोक को (तस्तम्भ) थाम्हे और रखा है| जो (बृहन्तं) बड़े-बड़े (नक्षत्रं) नक्षत्रों को (च) और (भूम) भूमि को (पप्रथत्) रचता तथा (नाकं) स्वर्ग (ऋष्वं) नरक को (द्विता) दो प्रकार से (नुनुदे) रचता है| (तु) निश्चय करके (अस्य) इस परमात्मा को (धीरा) पुरुष (महिना) महत्व द्वारा (जनूंषि) जानते हैं| 

भावार्थ: इस मंत्र का देवता वरुण अर्थात् परमात्मा है| भाव यह है कि परमात्मा के कुछ गुण और कर्म का  वर्णन यहाँ है जो हमें समझना चाहिए| परमेश्वर का अलौकिक कर्म यह है कि उसने तीनों लोकों की रचना की जो मंत्र में वर्णित है अर्थात् द्युलोक, पृथिवी लोक, अंतरिक्ष लोक आदि की रचना करता है| संसार में सब पदार्थों को रचता है| स्वर्ग = सुख नरक= दुःख को रचा है और विशेष बात यह भी है कि ऐसे परमात्मा को धीर पुरुष समाधिस्थ होकर विज्ञान द्वारा इसको अपने अंदर हृदय में अनुभव करते हैं| अतः हम लोगों को जो आचार्य  ने वैदिक शिक्षा दी  है, नाम-सिमरण, योगाभ्यास आदि का रहस्य समझाया है उसकी कठोर साधना करनी चाहिए| आप भी धीर पुरुष, धीर नारी कहलाएँगे| धीर पद का अर्थ है योगी जन, जो ध्यान में लीन रहते हैं| जैसे कि यजुर्वेद मंत्र ३१/१९ में कहा तस्य योनिम् परि + पश्यन्ति धीराः अर्थात् ध्यानी = योगी लोग उस परमेश्वर के स्वरूप को सब ओर देखते हैं|

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