स्वामी राम स्वरूप जी, योगाचार्य, वेद मंदिर (योल) (www.vedmandir.com)

उत्सूर्या बृहदर्चींष्यश्रेत्पुरु विश्वा जनिम मानुषाणाम् ।

समो दिवा ददृशे रोचमान: क्रत्वा कृतः सुकृतः कर्तृभिर्भूत् ॥ (ऋग्वेद ७/६२/१)

(सूर्य:) सब संसार के उत्पादक परमात्मा का (बृहत् अर्चींषी) बड़ी ज्योतियाँ (अश्रेत्) आश्रय लेती हैं| (भाव यह है कि सूर्य, चन्द्रमा, नक्षत्र आदि ३३ देवता की रचना परमेश्वर करता है| ये ३३ जड़ देवता हैं इनकी पूजा नहीं की जाती| यह जड़ देवता परमात्मा ने हमारे सुख के लिए बनाए हैं| यहाँ मंत्र में तात्पर्य है कि कार्यवाची सूर्य शब्द यह जो आकाश में चमकता भौतिक सूर्य है उसका ज्ञान देता है और कारणवाची सूर्य शब्द परमात्मा का ग्रहण कराने वाला है अर्थात् कारणवाची सूर्य का अर्थ परमात्मा है| अतः मंत्र में भी सूर्य नाम परमात्मा का है, जड़ पदार्थ का नहीं है| इसलिए मंत्र में कहा सूर्य: अर्थात् परमात्मा सब पदार्थों का रचयिता है| उस परमात्मा के आश्रय में बृहत् अर्चींषी बड़ी ज्योतियाँ अश्रेत् आश्रय में रहती हैं अर्थात् ईश्वर से ही उत्पन्न हैं और ईश्वर के आश्रय में ही रहती हैं|)

(विश्वा मानुषाणाम्) जो सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में रहने वाले मनुष्यों के अनंत जन्मों को (ददृशे) जानता है और (समः दिवा) सदा ही (रोचमान:) स्वतः प्रकाश है| (परमात्मा ही ब्रह्माण्ड में रहने वाले सब मनुष्यों के भूत, भविष्यत् तथा वर्तमान जन्मों को जानता है|

परमात्मा स्वतः प्रकाश अर्थात् स्वयंप्रकाशक है| भाव यह है कि पूरे संसार और संसार के पदार्थों – सूर्य, चन्द्रमा, पृथिवी, वायु, इत्यादि की तो रचना प्रकृति से परमेश्वर ने की है परन्तु परमेश्वर की रचना प्रकृति आदि किसी पदार्थ से नहीं की और न ही की जा सकती है| जैसे कुम्हार मिटटी से बर्तन बनाता है इसी प्रकार परमात्मा ने प्रकृति से सब संसार रचा लेकिन परमात्मा की रचना किसी भी पदार्थ से नहीं की गई| जो बनता है वह एक दिन नष्ट हो जाता है| संसार बनता है तो एक दिन नष्ट हो जाता है परन्तु परमेश्वर की रचना किसी पदार्थ से नहीं हुई इसलिए उसे वेदों में स्वतः प्रकाश अथवा स्वयं प्रकाशक कहा है क्योंकि ईश्वर को किसी ने नहीं बनाया इसलिए ईश्वर अजर, अमर, अविनाशी है| वेदों में उसको स्वयंम्भूः कहा है अर्थात् जो अपने आप द्वारा स्थित है| किसी ने नहीं बनाया|)

वही परमेश्वर (क्रत्वा कृतः) यज्ञ रूप है अर्थात् जब हम यज्ञ करते हैं तो वह यज्ञ में प्रतिष्ठित होता है और उस समय यज्ञमान, संगत इनके आसन, चम्मच, घृत, समिधाएँ, सामग्री आदि यज्ञ का सब स्थान भी ईश्वर से प्रकाशित हो जाता है| इसलिए यज्ञ को ईश्वर ने सर्वश्रेष्ठ शुभ कर्म कहा है अर्थात् इससे उत्तम शुभ कर्म तो हैं परन्तु यज्ञ सर्वश्रेष्ठ शुभ कर्म है| और (कर्तृभि:) अर्थात् इस जड़ और चेतन जगत् की रचना ने जिसको (सुकृतः भूत्) सर्वोपरि रचयिता वर्णन किया है| अर्थात् जगत् की रचना को देखकर यह अनुभव होता है कि यह रचना ईश्वर के अतिरिक्त कोई नहीं कर सकता| यह अद्भुत रचना है और रचना को देखकर ईश्वर का ज्ञान प्राप्त होता है| अतः वेदों में वर्णन प्रत्येक स्थान पर सूर्य शब्द का अर्थ आकाश में चमकने वाला जड़ सूर्य नहीं है अपितु मंत्र के देवता द्वारा अनुमान लगाकर सूर्य शब्द का अर्थ कहीं चेतन ब्रह्म है और कहीं-कहीं आकाश में चमकने वाला जड़ सूर्य| सब पदार्थों की रचना करने वाले एकमात्र चेतन परमेश्वर की पूजा हम करें, जड़ सूर्य की नहीं|

जड़ सूर्य की पूजा नहीं करनी चाहिए
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