Abhishek: त्रिवार वंदना 🙏🙏🙏 शुभ-कर्म, यम, नियम, आसन, प्राणायाम का ज्ञान हम कहसे प्राप्त करे, कृपा कर मार्गदर्शन करे.

Swami Ram Swarup: मेरा आपको आशीर्वाद, बेटा। बेटा, आपके प्रश्न का answer तो हम बार बार वेदों से सुनाते रहते हैं की ज्ञान का पहला दाता ईश्वर है, जिसने वेदों द्वारा आदिकाल में चार ऋषियों को ज्ञान दिया। चार ऋषियों से ब्रह्मा नामक मनुष्य ने चारों वेदों का ज्ञान प्राप्त कर लिया और यहीं से गुरु परम्परा प्रारंभ हुई। ब्रह्मा ने मनुष्यों को ज्ञान दिया, जो ऋषि कहलाये और ऋषि, गुरु रुप में आगे मनुष्यों को ज्ञान आज तक देते चले आ रहे हैं। अत: आपके प्रश्न का उत्तर वेदों में यही है की वेद एवं अष्टांग योग विद्या के ज्ञाता आचार्य/गुरु से वेद एवं योग विद्या तथा अच्छी शिक्षा का ज्ञान प्राप्त करें।

Anonymous: Pranam Swamiji. How are you? Please explain the translation of the mantra for offering prasad in the book. What is the meaning of Ashwamedh Yajyen and Nath? (Please answer in Hindi)

Swami Ram Swarup:

मेरा आपको हार्दिक आशीर्वाद, बेटी। मैं ठीक हूँ, बेटी।

1. बेटी पुस्तक में जो पहले paragraph का अर्थ किया है, उसका अर्थ है कि, हे ईश्वर! हमने जो संसार में कर्म किया, वो कर्म अधिक किया गया है या कम किया गया है, उन कर्मों को आप शुभ भावना से किया हुआ जाने अर्थात हमने जो कर्म किया है, वह शुभ भावना से किया है। दुसरे paragraph का भाव है कि, हे ईश्वर! मेरी सब शुभ भावनाओं को सत्य आहुति युक्त कर दें अर्थात मेरे मन में जो शुभ भावनाएँ, शुभ कर्म करने के लिए उठती हैं, वो भावनाएँ ऐसी हो जाएँ जैसे कि मैं सत्य वेद मंत्र की आहुति डालती हूँ। मेरी शुभ भावनाओं को पूर्ण करने वाले परमेश्वर, मेरी यज्ञ में डाली आहुतियों को शुभ बना देने वाले ईश्वर, मैं सब प्रायश्चित करने के लिए, आहुतियों को और कामनाओं को समर्थ करने वाले ईश्वर के लिए यह आहुति देती हूँ। सब प्रायश्चित का यहाँ अर्थ है कि जो मैंने आज तक पाप कर्म किये मैं उन्हें जीवन में दोबारा नहीं करूँगी।

प्रभु हमारी सब शुभ कामनाओं को पूर्ण कर दे क्योंकि मैं इस सत्य वेद वाणी अर्थात वेद मंत्रों द्वारा आहुतियाँ डालती हूँ। यह यज्ञ, आहुतियाँ, प्रार्थना आदि सब शुभ कामनाओं को पूर्ण करने वाले ईश्वर के लिए हैं। यहाँ मेरा अपना कुछ भी नहीं है।

2. अश्वमेघ यज्ञ का अर्थ है- देश के कल्याण के लिए यज्ञ करें। भाव यह है कि देश के कल्याण के लिए हम यज्ञ करें जिससे सब नर नारियों का उपकार हो।

नाथ का अर्थ है मालिक। ईश्वर सब सृष्टि का मालिक है। हम उसे प्रार्थना कर रहे हैं कि हे नाथ! तू करुणा रुप है, दूसरों पर करुणा अर्थात दया करता है। यदि कोई भी नर-नारी तेरे वेदों में बताई हुई शिक्षा को ग्रहण करता है तो तू उस पे करुणा अर्थात दया करता है। इसलिए हे नाथ! आपकी दया सब पर रहे। हे नाथ! आप करुणा के रुप हैं (अर्थात आप सब पर करुणा करते हैं) इसलिए आपकी करुणा/दया सब पर बरसे।

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