Sachin: Namaste guruji. mein 16 saal ka hoon. Mein ye janna chata hu ki kya koi student apni graduation karte samey ved padh sakta hai?
Swami Ramswarup: Han! Student ko hamesha vedon ka gyan leine kee agya vedon nein dee hai.vedon mein bhautik aur adhyatmik dono tarakki dono sath-sath karne ko kaha hai.

विश्वप्रिय: पूज्य स्वामी जी – सादर चरण स्पर्श !! आपके गीता भाष्य पुस्तक में बहुत ही नवीनता है और अन्य भाष्यकारों से ये बिल्कुल ही अलग है | मैंने कई भाष्य देखें हैं पर उनमें संस्कृत का सामान्य अर्थ ही दिया होता है, व्याकरण का प्रयोग नहीं मिलता | आशा है आप अपने गीता भाष्य के अंतिम पड़ाव में होंगे और १८ वें अध्याय का भाष्य कर रहे होंगे | मेरे ध्यान में गीता का एक श्लोक है जिसका प्रायः लोग गलत अर्थ करते हैं जबकि महर्षि दयानन्द जी के जीवन में इस श्लोक का अर्थ व्याकरण सूत्र के सहारे प्रकट किया है जो की नवीन है, आपकी सेवा में प्रस्तुत कर रहा हूँ, शायद आपके ज्ञान में वह पहले से ही होगा पर यदि ना हो तो अपने भाष्य में इसको स्थान दें | धन्यवाद |
====अथ उद्धरण ===
एक दिन एक सज्जन जो गीता का बड़ा प्रेमी था, स्वामी जी के पास आकार बोला की महाराज मैंने गीता की अनेक टीकाएँ देखी हैं परन्तु इस श्लोकर्ध का अर्थ समझ में नहीं आया | आप अनुग्रह करके इसका अर्थ मझे समझा दें | सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज स्वामी जी ने इसका अर्थ किया की ‘धर्म्मान्’ शब्द को यहाँ अधर्म्मान् समझना चाहिए | ‘शक्न्ध्वादिषु पररूपं वाच्यम्” व्याकरण के नियम के अनुसार सर्व में जो वकार में अकार है वह अधर्मान् के अकार में तद्रूप हो गया अर्थात् वह वकार का अकार उसमें मिल गया, इस प्रकार यद्यपि अधर्म्मान् शब्द ने धर्म्मान् का रूप ग्रहण कर लिया, परन्तु वास्तव में अधर्म्मान् ही रहा | यह अर्थ सुनकर वह मनुष्य बहुत प्रसन्न हुआ और स्वामी जी से उसने इस अर्थ की पुष्टि में प्रमाण माँगा तो उन्होंने ने वेद के दो तीन मन्त्रों का प्रमाण देकर उसका संतोष कर दिया | ===इति उद्धरण === आपका विनीत विश्वप्रिय
पूज्य स्वामी जी – सादर चरण स्पर्श ! प्रथम तो उत्तर के लिए धन्यवाद | आपके उत्तर से मेरी शंका का समाधान हुआ पर कुछ समय / दिन बाद कुछ और प्रश्न हुए, कुछ बातें विचित्र लगी शायद मेरी योग्यता नहीं है इसलिए मुझे इसमें विचित्र लग रहा है पर आपसे निवेदन है की आप पुनः विस्तार से समझाने का कष्ट करें | हमारे पूर्वज एक दूसरे को श्रवण के माध्यम से वेद मन्त्रों को याद किया / करवाया करते थे जिसके कारण एक-एक मात्रा, एक-एक अक्षर का अंतर नहीं होने पाता था पर कितना विचित्र लगता है की किस वेद का कहाँ समापन हो रहा है और कहाँ से प्रारंभ यह वे नहीं जान पाते थे और इस अंतर को बताने / जानने के लिए लिए व्यास मुनि जी को विभाजन करना पड़ा ? यह बात मुझे विचित्र लग रही है | कृपा कर समझाइए | दूसरा, सृष्टि को बने १ अरब ९७ करोड़ साल हो गये पर वेद का लेखन और विभाजन मात्र ५००० वर्ष पूर्व हुए व्यास जी ने किया और इसके पूर्व ऐसा प्रयास नहीं हुआ ये बात मुझे संतुष्ट नहीं कर रही है | कितना अटपटा लगता है की १ अरब ९७ करोड़ साल तक हमारे पूर्वज वेद को याद करते आए और सुरक्षित रखा पर ५००० वर्ष पूर्व व्यास जी ने उसका लेखन आरम्भ किया | शायद आपको मेरी बातें हास्यास्पद लगें पर …. स्वामी जी ! आपसे विनम्र निवेदन है की आप हिन्दी का उत्तर हिन्दी में दिया करिये | हिन्दी का लेखन अब बहुत ही सरल हो गया है | निम्न लिंक से आप हिन्दी टूल अपने कोम्प्युटर में इंस्टाल करें और हिन्दी सामान्य रूप से लिखें जैसे वेद लिखने के लिएआप को ved ही टाइप करना है | इससे पाठक को हिन्दी पढ़ने और समझने में सरलता होगी | आशा है आपको मेरा सुझाव सही लगेगा |
पत्र उत्तर की प्रतीक्षा में | आपका विनम्र विश्वप्रिय
Swami Ramswarup: Dhanyavaad. Mera tumhein ashirwad, sukhi raho.
Paramapara se jub ved Rishiyon se sune jaate thei aur shishya munh zubani yaad karte thei to kaalantar mein Rishiyon ko yeh anubhav hua ki shishya lagataar ved mantra yaad kar rahe hain aur samapan aur prarambh ka gyna nahin raha. Aisa kabhi nahin hua ki pratyek shishya buddhimaan hota hai aur sub kuchh theek samajh jaata hai. Bachpan mein ved to Kauravon nein bhi suney thei par sub bekar. Aur aisee bhraanti samaj ko thi Rishiyon ko nahin. Ho sakta hai aaj bhi yeh kami samaj mein ho. Aur is bare mein kuchh nahin kaha ja sakta ki 1 Arab, 96 crore, 8 lakhs, 53 thousand and 113 years prithivi ko bane hue ho gaye hain aur Vyasmuniji nein sava panch hazar varsh pehle kyun likha, auron nein pehle kyun nahin likha. Parantu Poojaneeya Vyasmuniji ko shat-shat namskar hai ki unhonein yeh mahaan karya sabhi ki bhalai ke liye kiya nahin to aaj prithivi par jo ghar-ghar mein chhape hue Ved hain weh kabhi nahin hotey kyunki birla hee koi parampara se munhjubaani ved yaad karta hai.

Gurmeet: Thanx swami ji.
Swami Ramswarup: You are welcome, my daughter.

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