Anupam: गुरुजी सादर प्रणाम।
गुरुजी गीता के श्लोक यदा यदा ही धर्मस्य ग्लानिर्भवति का अर्थ आपके द्वारा भावार्थ की गई वैदिक गीता से पढ़ रही थी कि जब धर्म की हानि होती है तब मैं आत्मा को रचता हूँ। गुरुजी पढ़ने पर समझ आया कि मुक्त आत्माएं 24 प्रकार की सामर्थ्य से युक्त रहती है व इक्षानुसार कोई भी व कभी भी शरीर धारण कर सकती है तो क्या ये मुक्त आत्माएं अपनी इक्षा से ही ऐसा कर लेती है या ईश्वर प्रेरणा से।जब ये आत्माएं मुक्त होती है तो शरीर धारण के उपरांत कष्ट क्यों पाती है जैसे कृष्ण का जन्म कारागार मे होना,उनके पुत्रो की मृत्यु होना, आदि।आपने प्रवचनों में बताया कि 36000 बार सृष्टि बने बिगड़े,इतने लंबे समय का मोक्ष होता है यानि उस समय जिस आत्मा ने कृष्ण रूप में जन्म लिया वो धर्म की हानि होने पर व अधर्म बढ़ने पर कोई न कोई रूप में पृथ्वी पर आती ही होगी तो क्या वह मुक्त आत्मा लोगो को अपने कृष्ण रूप को पूजता देखकर प्रसन्न होती होगी।अपने अथक परिश्रम के बाद किसी वैदिक धर्म पालक को समाधि प्राप्त होती है तो मुक्त आत्माओ जैसे कृष्ण राम दयानन्द आदि जो इस समय कोई योगी ही जानता है कि वे किस रूप में क्रियाशील है कि किस प्रकार पूजा की जानी चाहिए या ये ईश्वर उपासना से ही प्रसन्न होती है।गुरुजी मुझसे किसी ने कहा कि गीता में श्री कृष्ण जब वेदाधारित ज्ञान दे रहें है तो वे स्वयं अवतार वाद केविषय में क्यों कहरहे है।वैदिक गीता पढ़कर मुझे सही ज्ञान प्राप्त हुआ पर उपरोक्त प्रश्न मन में आये।गुरुवर समय मिलने पर मेरी शंका का निवारण करें।सादर नमन।

Swami Ram Swarup: Aashirvad beti. Yeh mukt jeevatmayein apni ichha se hi sab kuchh kar leti hain. Mukt jeevatmayein apni ichha se hi kisi bhi sharir mein jasti hain chahe sukh wala ya dukh wala ho. Jeevatma na Ram hai na Krishna hai na rishi muni hai yeh to sharir ka naam hai fir chahe woh karmanusar mukt jeevatma hai ya karmon mein fansi bandhan mein fansi jeevatma hai, uska to ek hi naam hai mukt jeevatma. Aashirvad beti.

R: Thank you guruji.. 

I will inform you about coming after discussing with family.

Swami Ram Swarup: Aashirvad beti whenever your parents agree to come here then you come with them.

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