Himanshu: Namaste Guruji, Mujhe karma, guna aur puruṣārtha ke sambandh me ek moolbhoot darshanik uljhan ho rahi hai, jise main spasht roop se samajhna chahta hoon.
Bhagavad Gita 3.27 me kaha gaya hai ki prakṛti ke guna — sattva, rajas aur tamas — hi sabhi karm karwate hain, aur ahankaar se mohit vyakti apne aap ko karta maanta hai.
Ye bhi kaha jaata hai ki ye guna humēn janm se milte hain. Janm mata-pita ke madhyam se hota hai, aur mata-pita, parivaar aur varna pichhle karmón ke phal ke roop me milte hain, jaise Chāndogya Upanishad 5.10.7 me janm aur gati ke siddhant ka varnan hai.
Is prakar, hum kis ghar me janm lenge, humari pravṛtti kaisi hogi, aur humare andar kaun-kaun se guna prabal honge — ye sab pichhle janmón ke karmón par nirbhar prateet hota hai.
Parantu isi janm me jo karm hum karte hain, ve bhi inhi gunón ke adheen hote hain. Aisi sthiti me ek mool prashn uthta hai:
Agar vyakti apne gunón ke adheen karm kar raha hai, aur guna khud pichhle karmón ka phal hain, to vyakti ki naitik zimmedari kahan rahi? Phir karma-phal ka nyay ka siddhant kaise sthapit hota hai?
Aisa lagta hai jaise vyakti ek chakra me bandh ho — pichhla karma guna deta hai, guna karm karwata hai, aur naya karma phir agla janm nirdharit karta hai.
Is sthiti me sudhaar ka avsar kahan hai? Agar bura karm “main” nahi balki mere guna karwa rahe hain, to phir mukti ka marg kaise sambhav hota hai?
Kripya spasht karein ki shastra is bandh se bahar nikalne ka upaay kaise batate hain. Kya buddhi, vivek aur puruṣārtha gunón se poorn roop se bandhe hue nahi hote? Kya gunón ke prabhav ke beech bhi vyakti ko apne karm chunne ki swatantrata hoti hai? Aur bhakti, jnana ya karma-yoga ke dwara guna-bandhan ka atikraman kaise hota hai?
Is prashn ka uttar mere liye atyant mahatvapurn hai, kyunki isi se nyay, daya aur moksha ke siddhant ko samajhne ka marg prashast hota hai.
Dhanyavaad guruji
Namaste.
Swami Ram Swarup: IS VISHYA MEIN NEECHE LIKHA GAYA ARTICLE PADHEIN USKE PASCHAT APNA PRASHN LIKHEIN AAPKO MERA ASHIRWAD.
Geeta shlok 3/27 –
ऋग्वेद मंडल 10 सूक्त 135 में समझाया है कि अजन्मा, अविनाशी एवं शुद्ध आदि अनेक गुणों से परिपूर्ण इस जीवात्मा को ईश्वर कर्म भोगने के लिए ज्ञानेंद्रियाँ, कर्मेंद्रियाँ एवं यह मानव शरीर प्रदान करता है। अतः यह ईश्वर रचित संसार मनुष्य के शुभ कर्म करने और पिछले कर्म भोगने का स्थान है। और यह ईश्वरीय नियम है कि जीवात्मा शरीर पाकर अच्छा या बुरा कर्म करने में स्वतंत्र है, परंतु कर्म फल मनुष्य के हाथ में नहीं है, किए हुए कर्मों का फल ईश्वर ही देता है। अतः यह मानव शरीर पिछले कर्मों को भोगने एवं नए वैदिक शुभ कर्म करके पिछले कर्मों का भी नाश करके मोक्ष प्राप्त करने के लिए है। अतः प्रथम तो यही है कि मनुष्य कभी आलसी न बनें। क्योंकि यह शरीर द्वारा ही पुरुषार्थ द्वारा गृहस्थ के शुभ कर्म करते हुए वेद विद्या एवं योगाभ्यास आदि को धारण करके सब अविद्या आदि क्लेशों का हम नाश करें। योग शास्त्र सूत्र 1/12 में कहा कि अविद्या आदि क्लेशों में फँसे रहने के कारण ही मनुष्य का जन्म होता है और वह कर्म इस जन्म और आगे आने वाले कई जन्मों में भोगे जाते हैं। प्रस्तुत श्लोक में यह समझाया है कि पंच भौतिक मानव देह प्रकृति के तीन गुण रज,तम, सत्त्व द्वारा बनी है। ऋग्वेद मंत्र 10/135/2-3 में कहा कि साधारण जन इस देह द्वारा पूर्व जन्म के कर्मों को भोगते हैं और निंदा-द्वेष आदि पाप वासना में फँसकर पुन: पाप करते हैं और दु:खी रहते हैं। परंतु पुरुषार्थी जीव शुभ कर्मों द्वारा पिछले कर्मों का नाश करके मोक्ष पद प्राप्त करते हैं। इस शरीर में अजर, अमर, शुद्ध, चेतन जीवात्मा निवास करता है, परंतु प्रकृति के इन तीनों गुणों से लगाव करके माया में फँस जाता है और अपने शुद्ध, चेतन स्वरूप को भूल जाता है। इस अवस्था में जीवात्मा अविवेकी की है और पुनः-पुनः कर्मों के अनुसार शरीर में आता-जाता है। अर्थात् जन्म-मरण आदि क्लेशों के बंधन में फँसकर दुःख उठाता है। शरीरस्थ जीवात्मा ही इस अविवेक अवस्था में अहंकारी होकर यह कहता है कि “अहम् कर्ता इति” कि मैं ही सब कर्मों को करने वाला हूँ। जबकि सब कर्म प्रकृति के तीनों गुणों के द्वारा ही होते हैं। रजोगुण में विषय विकार आदि गुण, तमोगुण में आलस आदि में लिप्त होना तथा सतोगुण में अहंकार रूपी गुण भरा पड़ा है। ईश्वर भक्ति का वास्तविक भाव पतंजलि ऋषि ने योग शास्त्र सूत्र 2/1 में कहा कि जब जीवात्मा साधना द्वारा ऐसी अवस्था में पहुँचता है कि सब कर्मों का फल ईश्वर को समर्पित कर देता है, तब वह कर्मों में लिप्त न होकर कर्म फल से छूटकर मोक्ष प्राप्त करता है। इसलिए योग शास्त्र सूत्र 1/48 में कहा कि साधक जब शुभ कर्मों एवं साधना द्वारा ब्रह्मावस्था को प्राप्त करता है तो प्रकृति के ये तीनों गुण उस पर प्रभाव डालना बंद कर देते हैं। अतः हम (जीवात्माएँ) गृहस्थ के शुभ कर्म करते-करते ही साधन विशेष द्वारा प्रकृति के इन तीन गुणों से अलग होकर अपने वास्तविक अविनाशी एवं शुद्ध स्वरूप में स्थित होएँ, तब शरीर में रहने वाला प्रत्येक जीवात्मा (नर-नारी) इस अहंकार से छूट जाएगा कि मैं कर्म करता हूँ। यहाँ ध्यान रखें कि जैसे मोटरसाइकिल, कार आदि स्वयं नहीं चलते, उन्हें कोई चलाता है। इसी प्रकार प्रकृति के तीनों गुणों द्वारा रचित मन, बुद्धि आदि अंतःकरण सहित यह शरीर मोटरसाइकिल की तरह जड़ होने के कारण स्वयं कार्य नहीं करता, इसमें निवास करने वाला जीवात्मा ही शरीर से कार्य करवाता है। इसमें भेद यही है कि वेदाध्ययन एवं योगाभ्यास आदि शुभ कर्म करने वाला साधक तो ऊपर कहे अनुसार तीनों गुणों से अलग हो जाता है और उसकी इंद्रियाँ स्वाभाविक अपने शुभ कर्मों को करती हैं। परंतु ऐसे जीवात्मा का अहंकार एवं विकार आदि से कोई लेन-देन नहीं रह जाता अर्थात् वह जीवात्मा कर्म फल का भोग नहीं भोगता। जड़ शरीर द्वारा यह कर्म इस प्रकार होते हैं जैसे जड़ सूर्य को तो प्रकाश चेतन ब्रह्म द्वारा दिया गया है। परंतु चंद्रमा जड़ सूर्य से प्रकाश लेकर अपनी चांदनी सब विश्व को देता है। यह अवश्य है कि ईश्वर सब में व्यापक है, तभी सब प्राणियों एवं सूर्य आदि ग्रहों में ईश्वर के व्यापक होने के कारण आपस में आकर्षण है। यदि ईश्वर सर्वव्यापक न हो तो फिर किसी भी नक्षत्र में आकर्षण असंभव है। आकर्षण का गुण ईश्वर में है, जड़ पदार्थों में नहीं। अतः प्राणी साधना द्वारा ऐसी अवस्था को प्राप्त करे कि शुभ कर्म तो वह करे लेकिन रज, तम और सत्त्व गुण से अलग अहंकार आदि का त्याग करता हुआ कर्म फल में लिप्त न हो। इसलिए ऋग्वेद मंत्र 10/135/4 एवं संपूर्ण वेदों में ईश्वर ने आदेश दिया है “विप्रेभ्य: परि प्रावर्तय:” अर्थात् वेद एवं योग विद्या जानने वाले विद्वानों से संपूर्ण वेद विद्या आदि की शिक्षा पाकर कर्म फल में न लिप्त होता हुआ मोक्ष सुख प्राप्त करे। रावण, दुर्योधन, कंस आदि जो प्रकृति के तीनों गुणों में बुरी तरह लिप्त थे। उनका यह अहंकार कि मैं राजा हूँ, सबका कर्ता-धर्ता हूँ, उन्हें ले डूबा। दुर्योधन महाभारत युद्ध में अपनी जान बचाकर एकांत में कहीं छिप गया था। पाँचों पांडव एवं श्रीकृष्ण महाराज दुर्योधन को ढूंढते-ढूंढते ऐसे स्थान पर पहुँचे जो स्थान गुप्त था और दुर्योधन का पता लगाना कठिन था। इस पर श्रीकृष्ण महाराज ने युधिष्ठिर को कहा कि दुर्योधन अहंकारी एवं अभिमानी है। आप जब जोर-जोर से दुर्योधन को युद्ध के लिए ललकारोगे और दुर्योधन के दिल को ठेस लगाने वाली बातों को जोर-जोर से बोलोगे तो दुर्योधन से रहा नहीं जाएगा और वह छुपे स्थान से निकलकर युद्ध से बाहर आ जाएगा। ऐसा ही हुआ और अंत में दुर्योधन अहंकार वश मारा गया।
केनोपनिषद् में कथा आती है कि अग्नि, वायु, इंद्र देवता आदि असुरों से युद्ध में जीत गए और वह एक स्थान पर इकट्ठे होकर नाचने, गाने खुशियाँ मनाने लगे। अचानक उस स्थान से कुछ दूर ज्योति स्वरूप यक्ष प्रकट हुआ। देवताओं के राजा इंद्र ने वायु देवता से कहा कि मालूम करो कि यह कौन है? वायु देवता यक्ष के पास जाकर जीत के अभिमान में बोला कि आप कौन हैं? यक्ष ने वायु देव से कहा आप कौन हैं? अहंकार में मग्न वायु देव बोला तू मुझे नहीं जानता मैं वायु हूँ, पेड़-पौधे, पर्वत यहाँ तक कि पूरी पृथ्वी को अपनी शक्ति से इधर से उधर फेंक सकता हूँ, तोड़ सकता हूँ इत्यादि। इस पर शान्त स्वभाव यक्ष ने एक तिनका वायु देव के सामने रखा और कहा इस तिनके को उड़ा कर दिखाओ। पूरी शक्ति लगाने के बाद भी वायु देव तिनके को हिला न सका और अपना सा मुँह लेकर वापिस चला गया व पुनः इंद्र देव ने अग्नि देव को भेजा। अग्नि देव ने भी यक्ष के सामने काफी डींगें मारी परंतु उस तिनके को वह न जला सका और न स्पर्श कर सका और हार कर वापिस चला गया। अंत में स्वयं देवताओं का राजा इंद्र यक्ष के पास पहुँचा, परंतु यक्ष वहाँ से गायब हो चुका था और उमा देवी प्रकट हो गई थी। उमा ने इंद्र देव को समझाया कि तुमने असुरों पर विजय ईश्वर की कृपा से पाई है और ईश्वर को ही भूल गए, जिस कारण तुम भी नष्ट हो सकते हो। इस पर इंद्र देव ने सब देवताओं को अभिमान-अहंकार छोड़कर ईश्वर की शरण एवं ईश्वर की आज्ञा में रहने का आह्वान किया।
अतः प्रकृति के तीनों गुणों से लिप्त होकर अहंकार वश जब-जब मानव और देवता भी अभिमानी होकर कार्य करते हैं तो उनका भी पतन होता है और उनके द्वारा किए हुए कर्म उनको भोगने पड़ते हैं। इस प्रकार जन्म-मृत्यु का चक्कर कभी समाप्त नहीं होता। वस्तुतः शुभ-अशुभ कर्मों का फल पुण्य एवं पाप है जो हमें सुख एवं दुःख रूप में भोगने होते हैं परंतु साधक जब प्रकृति के तीनों गुणों से अलग हो जाता है और फलतः स्वभाव वश केवल शुभ कर्म ही करता है और उन कर्मों का फल भी ईश्वर को अर्पित करके रखता है तभी प्राणी सुख-दु:ख अविद्या आदि क्लेश, कर्मों से छूटकर मोक्ष का सुख प्राप्त करता है। चेतन जीवात्मा प्रकृति रचित पंच भौतिक शरीर से अलग है। जीवात्मा प्रकृति रचित शरीर के बिना कोई कर्म नहीं कर सकता। इसी कारण विशेष से श्रीकृष्ण महाराज यहाँ कह रहे हैं कि “कर्माणि प्रकृते: गुणै: क्रियमाणानि” अर्थात् कर्म प्रकृति के गुणों द्वारा किए जाते हैं। चेतन जीवात्मा शरीर में रहकर भी शरीर से अलग तत्त्व है। अतः जीवात्मा वेद विद्या प्राप्ति द्वारा प्रकृति जीव एक ब्रह्म के रहस्य को समझकर शरीर एवं इंद्रियों से शुभ कर्म कराए। यह तो है विद्वान् की स्थिति कि जीवात्मा विद्वान् आचार्य से ज्ञान प्राप्त करके इंद्रियों एवं शरीर पर संयम रखकर अपने अधीन रखकर उन इंद्रियों से वेदोक्त शुभ कर्म करवाता है, कर्म फल भोगने से रहित होता है। अज्ञानी की स्थिति यह है कि जीवात्मा मन, बुद्धि, चित्त एवं पाँचों ज्ञानेंद्रियों का गुलाम बना रहता है। प्रकृति के तीनों गुणों के विकारों के अधीन रहता है और जो-जो मन, बुद्धि कहता है उसे ही मानता है तथा नर्क गामी होता है। अतः हम सत्य विद्या प्राप्त करके उन पर विजय पाकर उनसे शुभ कर्म कराते हुए मोक्ष प्राप्त करें।
प्रकृति जड़ है। प्रकृति के तीन गुण हैं — रज, तम और सत्त्व, जिनका वर्णन पीछे किया गया है। मन, बुद्धि, चित्त अहंकार, पाँच ज्ञानेंद्रियाँ, पाँच कर्मेंद्रियाँ एवं यह शरीर प्रकृति के गुणों द्वारा ही रचे गए हैं। (देखें ऋग्वेद मंडल 10 सूक्त 129) यह सब इंद्रियाँ, शरीर आदि जड़ हैं। इस शरीर में चेतन जीवात्मा जो शुद्ध, विकारों से रहित और चेतन तत्त्व है, रहता है। वेदाध्ययन एवं योगाभ्यास आदि साधना से रहित आम प्राणी (जीवात्मा) अपने शुद्ध स्वरूप को नहीं जानता अपितु प्रकृति के गुणों से लगाव करने के कारण अविवेकी होकर, योग शास्त्र सूत्र 1/4 के अनुसार जीवात्मा स्वयं को चित्त की वृत्ति के अनुरूप सुखी, दु:खी, रोगी और पाप कर्म करने वाला समझ बैठता है। वस्तुतः अविवेकी होकर वह जीवात्मा स्वयं को जड़ चित्त वृत्ति के रूप जैसा समझ लेता है। वेदाध्ययन एवं योगाभ्यास से हीन पुरुष समाधि को प्राप्त नहीं होता और स्वयं के अविनाशी स्वरूप को भूले हुए होता है। इस प्रकार माया में फँसा जीव अहंकार ग्रस्त मोह को प्राप्त होकर यह समझता है कि वह (जीवात्मा) ही पाप-पुण्य कर्म करने वाला है। यहाँ यह समझना आवश्यक है कि जीवात्मा अविवेकी होकर भ्रष्ट बुद्धि द्वारा वास्तव में इंद्रियों का गुलाम हो जाता है और जीव ज्ञानेंद्रियों से पाप युक्त सांसारिक ज्ञान मन, बुद्धि द्वारा प्राप्त करता है और भ्रष्ट बुद्धि की आज्ञा मान कर स्वयं ही कर्मेंद्रियों से पाप कर्म कराता है। इस कर्म करने की स्थिति को ही श्रीकृष्ण ने यहाँ प्रकृति के गुणों के द्वारा उत्पन्न विकारों में फँसे हुए जीवात्मा द्वारा अहंकारपूर्वक कर्म करने वाला कहा है। अर्थात् प्रकृति के रज, तम एवं सत्त्व, जो तीन विकार हैं जिनमें आलस्य और विषय-विकार आदि भरे पड़े हैं, इनसे रची हुई इंद्रियाँ और मन-बुद्धि आदि अंतःकरण हैं जिनमें विषय-विकार भरे हुए हैं। जीवात्मा इन्हीं विकारों में लिप्त होकर भ्रष्ट बुद्धि के अधीन होकर पाप आदि कर्म करता है। अन्यथा स्वयं तो जीवात्मा शुद्ध और चेतन है परंतु प्रकृति के गुणों से बनी इंद्रियाँ और मन-बुद्धि के अधीन हुआ पाप आदि कर्म करता है, इस पाप आदि कर्म करने की स्थिति को श्रीकृष्ण यहाँ कह रहे हैं कि सब कर्म तो प्रकृति के गुणों के द्वारा किए जाते हैं किए जाते हैं परंतु अहंकार से मोह युक्त अविवेकी जीवात्मा यह मान लेता है कि वह (जीवात्मा) ही कर्म करता है।
