Raj: Namaste Swami Ji, I remember you very well. You had come to my home and performed Havan at my home. I am sorry to know that you were not in good health. May Almighty God bless you with good health and long life. You have done a great service to humanity by preaching the wisdom of the Vedas. I have been taking Sanskrit classes in U.S.A. and these days also studying Ashtadhayayi. I have been studying Vedas for the past few years. I have studied Rig, Yajur And Sam Veda. These days I am studying Athar Veda. Best Regards, Raj Bhalla President Arya Samaj of Suburban New York.
Swami Ramswarup: Namasteji. Bhalla sahib, really I am very much pleased that you have started studying divine Sanskrit language and Vedas which is the main motto of human life and in the absence of which neither a person nor others can realise truth. Your study will surely make you more capable to spread Vedic knowledge in Arya Samaj and society.

May God bless you and my blessings are always with you. As regards my health, I am recovering slowly-slowly. Recently, I also wrote a new book during my illness named- “Vedon se Mrityu rahsya jano”. I hope you are in receipt of the same.

Gajraj: “ओउम -वन्दना”
हे ओउम दीजिये शक्ति, यथोचित काम सभी के आयेंI
दीनों पर करें दया और, जीवों को न कहीं सतायें II
सौरजगत निर्माता स्वयं हैं, पृथ्वी जिसका हिस्सा
उसे पलक झपकते विलय कराते, यह वेदों का किस्सा I
सब घूमें जीव स्वतन्त्र यहाँ, कोई परतंत्र ना हो जायें
हे ओउम दीजिये शक्ति, यथोचित काम सभी के आयें II
हो भेदभाव से रहित जगत यह, ईश हमारा सपना
सब जियें यहाँ उस प्रेमभाव से, “मत” हो अपना-अपना I
दो भक्तिभाव हे परमब्रह्म, ना “वेद” विहीन हो जायें
हे ओउम दीजिये शक्ति, यथोचित काम सभी के आयें II
वह तीस करोड़ और सरसठ लाख, वर्ष बीस हजार की गिनती
फिर होगी कथित “प्रलय” द्वापर सम, मिलजुल करते विनती I
ब्रह्माण्ड रचयिता हैं आप, हम सूक्ष्मात्मा कहलायें
हे ओउम दीजिये शक्ति, यथोचित काम सभी के आयें II
पुनः “आदिमनु” पैदा करते, मानवान्तर के स्वामी
तदोपरान्त सृष्टि चलती, वे अग्रज हम अनुगामी I
परमपिता वह सद्बुद्धि दो, गीत आपके गायें
हे ओउम दीजिये शक्ति, यथोचित काम सभी के आयें II
अग्नि वायु आदित्य अंगिरा,”वेदों” के अधिकारी
गले उतारे ओउम ने उनके, सबको दी जानकारी I
विघ्न निवारक और सुखदायक, जो ध्यावें सो पायें
हे ओउम दीजिये शक्ति, यथोचित काम सभी के आयें II
चौदह “मनु” निर्मित करते नित्य, “कल्प” जो कहलावे
दिन तीनसौ साठ ‘शतक’ में, महाकल्प बन जावे I
वर्ष इकत्तिस्सौदस बिन्दु चार खरब, की दीर्घायु वे पायें
हे ओउम दीजिये शक्ति, यथोचित काम सभी के आयें II
तदोपरान्त उस ब्रह्माण्ड के संग, स्वयं विलीन हो जावें
यह क्रम प्रभु का चले निरंतर, कभी रुकावटें न आवें I
दो श्रेष्ट आत्मा वह साहस, दुष्टों से ना झुक जायें
हे ओउम दीजिये शक्ति, यथोचित काम सभी के आयें II
किम कर्तव्य विमूढ़ किये, धर्मज्ञों ने अन्तर्यामी
क्षमा करें “गज” त्रुटि हमारी, ओउमम शरणम गच्छामी I
हे ओउम दीजिये शक्ति, यथोचित काम सभी के आयेंI
दीनों पर करें दया और, जीवों को न कहीं सतायें II
Is the poem correct as per Vedas?
Swami Ramswarup: My dear Gajraj singh ji. I have read your poem which is excellent. Yet, I shall again and again study it and would write you later on.

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