इस मंत्र का भाव है कि जैसे  जैसे पहले जमाने में  राजा चारों वेदों के ज्ञाता होते थे और प्रजा के लिए  प्रबंध भी करते थे और खुद भी उपदेश करते थेI उपनिषद में सच्ची कथा आती है कि एक ब्राह्मण के घर में अग्नि खत्म हो गईI जैसे वाल्मीकि रामायण  में आया कि न निरग्निः –  पिछले युगों में कोई घर ऐसा ना था जिसमें अग्निहोत्र ना होता होI सुबह यज्ञ होता था फिर सांयकाल को होता थाI सांयकाल को अग्नि कैसे प्रदीप्त की जाए?  माचिस तो होती नहीं थी पर वेदी में एक बार आदमी जलाई गई तो हवन कुंड में अग्नि बुझनी नहीं चाहिएI  वह इस प्रकार नहीं बुझेगी की सुबह खूब आहुतियां पड़ी तो उसी तरह शाम तक अग्नि होती थीI उसी तरह अग्नि से सांयकाल का यज्ञ खूब होता थाI  फिर सुबह वह आदमी हवन कुंड में प्रदीप्त रहती थी  और उससे फिर अग्नि जलाई जाती थीI  इस प्रकार हवन कुंड में अग्नि समाप्त नहीं होती थीI 

पर एक बार ब्राह्मण के हवन कुंड में अग्नि खत्म हो गई और वह अग्नि लेने के लिए राजा के घर गयाI राजा ने उस ब्राह्मण को उपदेश दिया और तिरस्कार किया तुम्हारे घर में एक टाइम का हवन छोड़ने की वजह से अग्नि खत्म हो गईI  ऐसा कह कर फिर बाद में अग्नि दीI  वैसे पुरातन समय में हर एक राजा ज्ञानी थेI  कोई ऐसा राजा नहीं था जो उपदेश नहीं करता थाI  जिसके अंदर विद्या है वह तो बोलेगा ही बोलेगाI 

 तो यहां पर यह भाव है कि जैसे विद्वान में प्रसिद्ध हुए जान उपदेश करते हैं वैसे  हम भी उपदेश करेंI  यह ज्ञान बहुत जबरदस्त है कि जितना जितना तुम को आता है  समझदार बनकर उसको उपदेश करोI लोगों में ज्ञान बरसाओ  अगर कोई नहीं मानता तो ना मानेI  हो सकता है कि कोई ना कोई जिज्ञासु होI  जैसे विद्वान लोग प्रवचन करते हैं वैसे ही जनता का कर्तव्य है कि जितना ज्ञान गुरु से वो पाया है उसको आगे प्रचार करेंI 

बच्चों का नामकरण संस्कार १०१ दिन बाद किया जाता हैI इससे पहले आप उन्हें किसी प्यार के नाम (nickname) से बुला सकते हैंI जन्म के समय यज्ञ होना आवश्यक हैI

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