ऋषियों की उत्तम अवस्था के दर्शन से कई जन्मों के पाप मिट जाते हैं। 

ओ३म् उतो पितृभ्यां प्रविदानु घोषं महो महद्भ्यामनयन्त शूषम्। 

उक्षा ह यत्र परि धानमक्तोरनु स्वं धाम जरितुर्ववक्ष॥ (ऋग्वेद मंत्र ३/७/६)

हे मनुष्य! जैसे यह ब्रह्मचारी लोग अपने आचार्य की सेवा करते हैं।  ब्रह्मचर्य को,  माता पिता के साथ पूज्य ऋषि मुनि को वेदों के ज्ञान से प्राप्त करते हैं।  माता पिता गुरु की सेवा करते हैं।  देवपूजा  संगतिकरण दानेषु इति यज्ञः। जो समझदार हो जाते हैं और अपने गुरु की सेवा करते हैं,  माता पिता की सेवा करते हैं और उससे यह जो विद्या को  पाते हैं।  तो आप लोग भी ऐसा करके, और प्रातः काल 

 ईश्वर की स्तुति,  माता पिता गुरु की सेवा आदि से धर्म आचरण करके, कर्तव्य करके, धर्म का सुख प्राप्त करो।  पाप का सुख एक ना एक दिन बर्बाद करके छोड़ेगा।  ऐसे तो शुभकर्म हम करेंगे –  सेवा,  यज्ञ, अग्निहोत्र, योगाभ्यास  जो भगवान ने बताए हैं, ऐसा करो। 

शुरू शुरू में चार ऋषियों को प्रेरणा देकर कराए। वे हर वेद का ज्ञान आचरण में लाए  और उन्होंने आगे ब्रह्मा को दिया, और आखिर ब्रह्मा ने दुनिया को दिया।  जैसे अन्य सेवा करते हैं,  आचार्य प्रसन्न करते हैं, आप  भी करो।  ना करो तो अधर्म है।  धर्म तो यही है।  साक्षात आप सुन रहे हो ना यही धर्म है।  धर्म से कमाया हुआ सुख प्राप्त करो।  वेद ने कहा कि जिनके माता-पिता नहीं है वह यह पाप गुरु की सेवा करके धोवें। और जिनके माता-पिता है वह उनको तन, मन, धन व प्राण से सेवा करके पापों को धोवें।  अगर जीवित रहकर माता-पिता की सेवा में कमी आई तो वो पाप है।  वह पाप को सेवा से धोना पड़ता है।

ओ३म् अध्वर्युभिः पञ्चभिः सप्त विप्राः प्रियं रक्षन्ते निहितं पदं वेः। 

प्राञ्चो मदन्त्युक्षणो अजुर्या देवा देवानामनु हि व्रता गुः॥ (ऋग्वेद मंत्र ३/७/७)

हे मनुष्य!  ऋत्विज के साथ लोग बैठ गए हैं और हवन कुंड में आहुतियाँ पड़ रही हैं।  यज्ञ में सात हवन कुंड है और उसमें अलग-अलग दूर तक संगत बैठी है।  यज्ञ चल रहा है। वो लोग यज्ञ को पूर्ण करके प्रजा को सुख देते हैं। यही तरीका है कि यज्ञ करके प्रजा को सुख दो।  बाकी आज जो चल रहा है वह वेद के अनुसार नहीं है।  धन तो चाहिए ही चाहिए, अन्न भी चाहिए, पर ये चीजें  यज्ञ से पैदा होती हैं।

श्री कृष्ण ने भी बोला है कि यज्ञ से  पौष्टिक अन्न  उत्पन्न होता है। पर यह तो कोई सोचता ही नहीं है।  श्री कृष्ण कहते हैं कि हे अर्जुन! बच्चों को पौष्टिक आहार तब होगा जब यज्ञ से शुद्ध वर्षा बरसेगी और शुद्ध अन्न पैदा होगा। वो शुद्ध अन्न से बच्चे शुद्ध और तंदुरुस्त होएंगे। इस चीज को कौन समझ रहा है?  यह चीजें समझ लेनी चाहिए कि घर-घर यज्ञ कराने का कार्य शुरू हो।   यज्ञ के ना होने की वजह से ही करोना हुआ है।  यज्ञ ज्यादा होने चाहिए। 

विद्वान लोग जो हैं धर्म आचरण से, अध्यापक की तरह, सारे मनुष्य को आनंद दो।  जैसे सात ऋत्विज  होते हैं वह बहुत सारी प्रजा के लिए यज्ञ करके सुख देते हैं।  आज तो कोई नहीं कर रहा है।  भगवान सब ऋषि जैसे यज्ञ करके प्रजा को सुखी करते हैं।  यज्ञ में ईश्वर है जो की सुख का दाता है।  यज्ञ करना उसकी पूजा है तभी वह सुख देता है।.

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