ईश्वर से यह प्रार्थना है कि वह यज्ञ को पूर्ण करें।  संसार को तो मैं कब का त्याग चुका हूँI बस, धर्माचरण हैI  शिष्यों की देखभाल करनी हैI बरसों से हम अंदर ही हैंI पहले भी केवल यज्ञ के लिए ही बाहर आते थेI

ओ३म् आ याह्यग्ने समिधानो अर्वाङिन्द्रेण देवैः सरथं तुरेभिः। 

बर्हिर्न आस्तामदितिः सुपुत्रा स्वाहा देवा अमृता मादयन्ताम्॥ (ऋग्वेद मंत्र ३/४/११)

 इस मंत्र में वाचकलुप्तोअलंकार हैI 

भावार्थ: हे मनुष्या यथा विद्युदादिपदार्थैश्चालितानि यानानि भूसमुद्राऽन्तरिक्षेषु सद्यो गच्छन्ति तथा विद्वच्छिक्षया विद्याः प्राप्य सद्यो गुरुकुलं गत्वा ब्रह्मचारिण आगत्य सर्वानानन्दयन्त्विति। 

(हे मनुष्या यथा विद्युदादिपदार्थै) यह विद्युत आदि पदार्थों से चलाए हुए (यानानि) यान, रथ आदि   (भूसमुद्राऽन्तरिक्षेषु सद्यो गच्छन्ति) वह जो यान हैं वे आकाश में भी उड़ते हैं,  ship जैसे चलते हैं, लाभ देते हैं,  इनसे तो आज बिजनेस आदि हो रहा है। यह बिजली से चलते हैं। वैसे विद्वानों की वेद की विद्या को प्राप्त होकर शीघ्र ब्रह्मचारी बनकर व गुरुकुल जाकर विद्या प्राप्त करके सबको आनन्द दें। देखो, ईश्वर विद्वान को नहीं छोड़ रहा है। 

ब्रह्मचर्य से character (चरित्र) टिका हुआ है अगर ब्रह्मचर्य नहीं तो इंसान चरित्रहीन (characterless) है। Without Brahmcharya, everything is lost. मैं आपको बड़े प्रेम से शिक्षा देता हूँ। मेरी पुस्तक भी पढ़ो कि गृहस्थ में कैसे ब्रह्मचारी रहा जाता है अथवा 60 साल के बाद पूर्ण ब्रह्मचर्य होना चाहिए। 

अगर भगवान और गुरु से प्रेम है तो 60 साल के बाद पूर्ण ब्रह्मचर्य रखना चाहिए। अगर नहीं रखते हैं तो उनके शरीर से दुर्गंध आती है और दांतो, कानों व नाक से भी दुर्गंध आती है।  इससे बचो।  शीघ्र मृत्यु आती है।  ब्रह्मचर्य से आयु बढ़ती है।

ईश्वर ने कहा कि इतनी बड़ी धरती है।  श्री राम, दशरथ आदि ये  पृथिवी के राजा रहे हैं।  एक राजा इतनी बड़ी जनता को ब्रह्मचर्य से ही संभालता है।  यह महाभारत तक राजा लोग अपनाते थे।  राजा ब्रह्मचर्य से ही प्रजा का पालन पोषण करते थे। यह सारा समझना चाहिए।

Someone asked a question on www.vedmandir.com that who am I and what is the purpose of life? You know the answer to the question of who am I. 

आप जीवात्मा हो, ऐसा उत्तर दो। हम शरीर नहीं हैं।  यह मनुष्य का शरीर जानवरों से अलग है।  तो इसका motto की जीवात्मा शरीर के द्वारा वेद मार्ग पर चला कर अपने को ब्रह्म अवस्था प्राप्त करे। It is the motto. जानवर ईश्वर को प्राप्त नहीं करते हैं।  मनुष्य योनि में जो भी जीवात्मा है वह ईश्वर को प्राप्त कर सकती है। वह भी अगर विषय-विकार, राग-द्वेष, बुराई में फंसी है तो समझो वह अगले जन्म को खराब कर रही है। उसका अगला जन्म कुत्ता बिल्ली आदि में ही होगा।  इसको समझ कर के अपने लक्ष्य की तरफ चलो। 

जो विद्यार्थी वेद को  जानता होगा और दूसरों से बात करेगा तो उनको आनंद आएगा। वेद नहीं जानते होगे तो गाली गलौज और बुरी भाषा का इस्तेमाल करोगे। 

इसलिए वेद जानकर सबको सुख दो। ईश्वर इस मंत्र में यह कह रहा है। ईश्वर के तो हम बच्चे हैं। ईश्वर सबका कल्याण चाहता है।  आज जो मजहब बने हैं वह सब का कल्याण नहीं चाहते हैं। वे सिर्फ उसी मजहब वालों का कल्याण चाहते हैं। यह गलत है।  जैसे ईश्वर सबका कल्याण चाहता है वैसे हमें भी  सब के कल्याण के लिए सोचना है। तन्मे॒ मनः शि॒वसङ्कल्पमस्तु (यजुर्वेद मंत्र ३४/१-६) – हमारे कल्याणकारी विचार हों।

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