अनन्ता वै वेदाः – वेद तो अनंत हैं यानी वेद का ज्ञान तो अनंत है और यह कई जन्मों में जीव इसको पा लेता है। यह अमृतवाणी है, मतलब मरती नहीं है। जो आपने सुन लिया है तो आपका हो गया। अगले जन्मों में जो सुनोगे जो पहले सुना नहीं। देव योनि में आओगे फिर जीव भटकेगा नहीं। 

मनुष्य को चाहिए कि जो सूर्य के समान विद्या के प्रकाशक हैं, अग्नि के समान सब दु:खों का नाश करने वाले हैं – ये दो ही हैं। सूर्य के समान विद्या का प्रकाश करने वाले, और अग्नि जैसे सब को जलाकर नष्ट कर देने वाली है, वैसे ही दुखों का नाश करने वाले यह ईश्वर या विद्वान यह दोनों हैं। लेकिन भगवान कहता है मैं निराकार हूं – मैं कुछ बोलता नहीं हूँ। 

तो जैसे सूर्य के समान विद्या के प्रकाशक कहते हैं – जैसे सूर्य निकलता है भूमि की सब चीजें दिखाई देती हैं, जैसे सूर्य अंधेरे का वातावरण को नष्ट कर देता है। इसी प्रकार पहले आप खुद प्रैक्टिकली देखो कि पहले यह वेद विद्या आप में छुपी हुई थी। आप इसको नहीं जानते थे। फिर गुरू का ज्ञान मिला तो सच का बोध होता चला गया। इसलिए कहा कि जैसे सूर्य अंधकार का नाश करता है गुरू सूर्य के समान ज्ञान देकर के अज्ञान को नाश करता है। 

जैसे यज्ञ क्या है, सिमरन क्या है हवन क्या है ऐसा करते-करते धीरे-धीरे आपका अंधकार का पर्दा हट आएगा। 

तो विद्वान को अपनी आत्मा में आश्रय दो। आत्मा में आश्रय करो का मतलब गुरू को आत्मा में धारण करो । दुष्ट व्यवहारों को त्यागते हुए एकदम स्वच्छ हो कर, काम-क्रोध आदि सब का नाश कर दो। यह तो तुम्हारे हाथ में है। विद्या द्वारा अज्ञान का नाश करना गुरू के हाथ में है। यदि आप बुराइयों को त्यागने का प्रयास करोगे तो “God helps those who help themselves.” तभी ईश्वर और गुरू  मदद करेंगे और सब में आग लगा देंगे।

अगर आप कोशिश नहीं करेंगे तो कोई मदद मिलेगी ही नहीं। आपको आलस्य का त्याग करना चाहिए। गुरू को आत्मा में धारण करके बुराइयों का नाश करके सत्य व्यवहारों में स्थिर होकर साथ साधना करके सुखी रहो। सत्य मतलब जो-जो वेद बोल रहा है, उस सत्य को अपनाओ , बड़ों का आदर करो, मीठी वाणी बोलो, यज्ञ करो, धार्मिक बनो, धार्मिक कर्म करो, बुरे कर्म मत करो, झूठ मत बोलो, छल कपट मत करो, बुराइयों को समझो और उनको त्यागो फिर गुरू को अपनी आत्मा में बैठाओ। फिर जीव का कल्याण होगा।

फिर ऐसा करोगे तो सदा सुखी रहोगे। यह यह गुरू परम्परा भगवान ने दे दी है। सुखों को प्राप्त करो, सुखी रहो। मेरे मुंह से हमेशा यही निकलता रहता है – जीते रहो या लंबी आयु हो या सुखी रहो। यह ईश्वर का ज्ञान है कि सब बुराइयों को छोड़कर आलस्य का त्याग करना है। 

अर्थ का भी अगर ज्ञान लोगे तो तर जाओगे। गुरू पर संशय नहीं किए जाते अन्यथा जीव का नाश हो जाता है। 

ओ३म् वनेम पूर्वीरर्यो मनीषा अग्निः सुशोको विश्वान्यश्याः॥ (ऋग्वेद मंत्र १/७०/१)

ओ३म् आ दैव्यानि व्रता चिकित्वाना मानुषस्य जनस्य जन्म ॥ (ऋग्वेद मंत्र १/७०/२)

मनुष्य का कार्य कारण मैंने बहुत दिनों से समझाया है। जैसे पुत्र कार्य है, कारण माता-पिता हैं| ऐसे ही यह सारा संसार है, इसको मंत्र में बोल रहे हैं कि यह संसार जो है यह कार्य है। इसका कारण परमेश्वर और प्रकृति हैं। परमेश्वर की अकेली शक्ति नहीं है, प्रकृति भी इसका कारण है। परमेश्वर निमित्त मात्र है और उपादान कारण प्रकृति है। संसार का निर्माण करने का कारण वह प्रकृति है, उसके रजोगुण, तमोगुण और सतोगुण से यह सारा संसार बना है। 

प्रकृति निढाल पड़ी थी। ईश्वर की जरा सी शक्ति ने प्रकृति को ताकत दी। जैसे ही प्रकृति में ईश्वर की शक्ति कार्य करती है, यह संसार बनना शुरू हो जाता है। यहाँ यह बताया है कि दोनों का ज्ञान लेना।

शुद्ध कर्म करने हैं और उनसे मनुष्य जन्म सफल होता है। गुरू ज्ञान ना दे फिर तो कुछ भी नहीं है। जो ज्ञानवान पुरुष है, विद्वान है, वही ज्ञान देता है। रिपीट करो, चार ऋषियों को ईश्वर ने ज्ञान दिया और ब्रह्मा ने इनकी सेवा करके ज्ञान प्राप्त किया और इनसे परम्परा शुरू हुईऔर आज तक चली आ रही है।  परमेश्वर बोल नहीं सकता और याद रखो कि ज्ञान लिखा पढ़ा नहीं है। इस ज्ञान को लिख नहीं सकते हो। यह बात अलग है कि लोगों ने संहिता बना दी है पर उसका नियम अलग है। 

जैसे संहितायाम् सूत्र है। भगवान ने यहां ज्ञान दिया कि विद्वान शुद्ध-गुण-कर्म का जीव को ज्ञान दें। जैसा कि तुम शरीर नहीं हो, तुम शरीर में रहते हो। तो जो यह ज्ञान देता है उसकी उपासना सत्कार करो। यानी गुरू जो अग्नि के समान ज्ञानवान हो। जैसे अग्नि में जो डालो वो भस्म, ऐसे ही सब दुखों को नाश करने वाला है। 

बुद्धिमान, विद्या और धर्म अनुष्ठान.. (मानुषस्य) मनुष्यों में श्रेष्ठ विद्वान है। एक तो मनुष्य जाति है में वो जन्म लिया हो, उस विद्वान को अच्छी प्रकार से सेवा करें और धारण करें। मतलब वह जिंदा हो और मनुष्य जाति में शरीर धारण किया हो। उसको गुरू धारण करो। गुरू जो हो वह शरीर धारण करता है। 

(जनस्य) जन हो वह।  (दैव्यानि) दिव्य कर्म सिद्ध किए हुए हों, वो हमारा गुरू हो। इसके बिना मनुष्य जन्म सफल नहीं होता। गुरूऔर ईश्वर के बिना कोई भी वस्तु जो है वो अप्राप्त नहीं है। 

चेतन स्वरूप जीव कर्म-फल के बिना एक क्षण भी नहीं रहता। वह भोगते ही रहता है। क्षण क्षण में भोगता रहता है। जीव पिछले जन्मों के कर्मों को प्रारब्ध रूप में लेकर आया है। इस रहस्य को समझकर सारा पाप छोड़कर जीव को अच्छे कर्म में आना चाहिए। 

आप अच्छे थे, फिर एक क्षण में विपत्ति आएगी। बीमारी थी वह ठीक हो गई और कुछ समस्या आएगी। ऐसा पल पल में जीव भोगता है। ईश्वर और गुरू कृपा से इसका नाश कर सकते हैं। ईश्वर जिसमें प्रकट है वही ज्ञान दे सकता है। उसी की सेवा भक्ति करके उसको अपनी आत्मा में रखो। वह तो आपकी आत्मा है। उसके बिना आपको एक क्षण भी सुख नहीं मिल सकता है। इसीलिए ईश्वर जो अंतर्यामी है उसको गुरू कृपा से जानो। बार-बार मैं आपको शिक्षा दे रहा हूँ कि पाप कर्म को छोड़ो। और कई तो उसको नाश गुरू ही करेगा, यदि करेगा।

जैसे पृथिवीआदि कार्य रूप अनेक परमाणु के सहयोग से बनती हैं और वियोग से नष्ट होती है। संयोग मतलब परमाणु को किसी अनुपात (ratio) में जोड़ना। संसार में जितने भी शक्ल दिख रही हैं ये परमाणु के जोड़ हैं। पेड़, पौधे आदि सब मूर्ति हैं। अब प्रलय आएगी तो इनका वियोग होगा जिस अनुपात में मिलाये थे, वह अनुपात भगवान तोड़ देगा । यानी वह मूर्तियां नष्ट हो जाएँगी। यह चलता रहता है। जीव, ईश्वर और कारण रूप प्रकृति यह नष्ट नहीं होते हैं। शरीर नष्ट होता है, जीव नहीं।

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