स्वामीजी यज्ञ कराते हुए

ओ३म् प्र मन्महे शवसानाय शूषमाङ्गूषं गिर्वणसे अङ्गिरस्वत्। 

सुवृक्तिभिः स्तुवत ऋग्मियायार्चामार्कं नरे विश्रुताय ॥ (ऋग्वेद १/६२/१)

(सुवृक्तिभिः) दोषों को दूर करने वाले क्रियाओं से (शवसानाय) बल युक्त (गिर्वणसे) वेद वाणियों से, स्तुति के योग्य जो है (ऋग्मियाय) ऋचाओं से प्रसिद्ध (नरे) न्याय करने। 

जैसे हम दोषों को दूर करने वाले क्रियाओं से काम, क्रोध, मद, लोभ से दूर करके, ऐसा करके, वेदवानी की स्तुति से, ऋचाओं से प्रसिद्ध (विश्रुताय) अनेक गुणों के होने के कारण श्रवण करने योग्य  (स्तुवते) सत्य की प्रशंसा करने वाले परमेश्वर या सभाध्यक्ष (राजा), उनके लिए, (अङ्गिरस्वत्) प्राण के बल के समान (शूषम्) बल और (अर्कम्) पूजा के योग्य (आङ्गूषम्) विज्ञान को जानने वाले राजा और परमेश्वर की पूजा करें| 

यह ऋचाएँ हैं। वेद मंत्र के मनन चिंतन इन्हीं से ईश्वर की पूजा और विद्वानों का आदर मान-सम्मान करें। तो मनुष्य को चाहिए कि – जैसे परमेश्वर की स्तुति की जाती है, प्रार्थना उपासना से सुख पाए जाते हैं और पिछले जन्मों का कर्म भी इस ज्ञान, प्रार्थना, उपासना से नाश करना है। 

वेद मंत्रों से यज्ञ या घर में अग्निहोत्र अवश्य करें। यज्ञ अगर यह होता है तो सबसे उत्तम है नहीं तो घर में अग्निहोत्र जरूर करें। 

वैसे ही, सभाध्यक्ष (राजा) के आश्रय में रहकर हम पुरुषार्थ करें। परमार्थ का भाव यही है कि हम प्रार्थना इत्यादि यह सब करें, इंद्रियों को संयम में रखते हुए उधर अग्नि में आहुतियां डालें इधर राजा की आज्ञा में हम अधीन होकर पुरुषार्थ करें, आलस्य त्यागें तो परम सुख को प्राप्त करते हैं। आज एक ही कमी है कि राजा लोग वेद नहीं जानते। नहीं तो भारतवर्ष जैसा पहले था, बाहर से विद्यार्थी आकर सब विषयों का ज्ञान लेते जाते थे जैसे गणित विद्या इत्यादि का।

ओ३म् प्र वो महे महि नमो भरध्वमाङ्गूष्यं शवसानाय साम।

येना नः पूर्वे पितरः पदज्ञा अर्चन्तो अङ्गिरसो गा अविन्दन् ॥ (ऋग्वेद मंत्र १/६२/२)

हे मनुष्य! सुनो! जो तुम हो और हम (वः नः) लोगों को, (अङ्गिरसः) प्राणायाम आदि (पदज्ञाः) धर्म अर्थ काम मोक्ष को जानने वाले (महि शवसानाय) महान ज्ञान बल युक्त सभाध्यक्ष के लिए, यानी राजा के लिए, क्या करें? हम और तुम, प्राण आदि विद्या से, धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष को जानने वाले.. अब देखो वही बात आती है कि राजा वेदों को भी जानता हो और अर्थ, काम, मोक्ष को भी जानता हो और ज्ञान से भी युक्त हो। ऐसे सभाध्यक्ष के लिए (महि साम) बहुत दुख नाश करने वाले (आङ्गूष्यम्) जिस विज्ञान युक्त हुए (पितरः) विद्या से रक्षा करने वाले विद्वान लोग, (येन) जिस विज्ञान और कर्म से विद्या प्रकाशित वाणियों को (अविन्दन्) प्राप्त हो। (प्रभरध्वम्) उनका तुम लोग पालन-पोषण सदा करो। जो भी महान सभाध्यक्ष हैं, तो उनके लिए, ज्ञान युक्त जो हैं, दुख को नाश करने वाले (नमः) नमस्कार करो कि वह विद्वान है, मोक्ष को जानने वाले हैं (अर्चन्तः) अन्न का सत्कार करें और उनका दान करें। (येन) तो जिस विज्ञान और कर्म से विद्या प्रकाशयुक्त वाणियों को हम प्राप्त हों। उनका तुम लोग पालन-पोषण सदा करो। 

जैसे विद्वान लोग वेद सृष्टि-कर्म उत्पत्ति परमाणुओं से कहे हुए, धर्म युक्त मार्ग से चलते हुए सब प्रकार परमेश्वर का पूजन करके सबके हित को धारण करते हैं वैसे ही तुम लोग करो। विद्वान की शरण में जाकर ही विद्या धीरे-धीरे समझ में आती है।

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