स्वामी राम स्वरूप जी यज्ञ कराते हुए

ओ३म् यद्देवानां मित्रमहः पुरोहितोऽन्तरो यासि दूत्यम् । सिन्धोरिव प्रस्वनितास ऊर्मयोऽग्नेर्भ्राजन्ते अर्चयः ॥ (ऋग्वेद मंत्र १/४४/१२) 

इसमें परमेश्वर की महिमा है| जैसे परमेश्वर सबका मित्र है, वह किसी से राग द्वेष नहीं करता, सिर्फ न्याय करता है| दुष्टों पर क्रोध करता है और सज्जनों की रक्षा करता है| यह वेदों ने स्पष्ट कहा है| 

यह परमेश्वर के बारे में जानना चाहिए| आपने दूसरा मंत्र सुना कि एक तो ईश्वर के गुण कर्म स्वभाव को जानो और विद्वान के गुण कर्म स्वभाव को जानो और उनकी दोनों की भक्ति करो| तो निश्चित ही आप तर जाएंगे|

भगवान जो है वह सबका मित्र बन जाता है जब हम उसके गुण कर्म स्वभाव आदि पदों को सुनते हैं और जानने का प्रयास करते हैं| तो मुझे नहीं पता कि अभी मेरी आयु कितनी शेष है पर जब तक रहूँगा मैं प्रचार करूँगा| जाना तो एक दिन है ही| इसलिए आप वेद सुनो, परिवार सुने, सुनने से ही शक्तियां काम करती हैं, आप की रक्षा करती हैं और ईश्वर मित्रता करेगा|

किसी ने प्रश्न किया कि – श्री राम रक्षा के लिए जंगल में गए थे| वहाँ राक्षस ऋषि मुनि पर कैसे प्रहार कर सकते थे? यह वेद मंत्र रक्षा नहीं करेगा? 

वाल्मीकि रामायण में कहा कि वो ऋषि मुनि जंगल में हवन कर रहे होंगे और राक्षस आकर तंग करने के लिए आते थे पर ऋषि मुनि वहाँ से भाग जाते थे| किसी ऋषि मुनि का उन राक्षसों ने खून नहीं बहाया| फिर श्रीराम जंगल में गए और उन्होंने रक्षा शुरू की| फिर ऋषि मुनि ने भागना बंद कर दिया| श्रीराम ने चुन चुन कर राक्षसों का वध कर दिया| 

जैसे एक मंत्र में कहा है – ‘न तस्य मायया चन रिपुरीशीत मर्त्य:‘ – जो अग्नि में आहुति डालता है उनका कोई बुरा नहीं कर सकता| राक्षसों ने ऋषि मुनि को सताया पर कोई उनका वध नहीं कर पाया| समय आने पर सारी सुरक्षा ईश्वर ने अपने हाथ में ले ली| विद्वान के गुण कर्म स्वभाव को जानो फिर जीव इस भवसागर से तरता है|

जैसे परमेश्वर सबका मित्र है और पूजनीय है, पुरोहित है, अंतर्यामी है, सत्य-असत्य कर्मों का भी प्रकाश करता है| 

वेदों से सत्य को अपना लेना और असत्य को छोड़ देना – ईश्वर यह सारा ज्ञान अंदर प्रकट करता है इसलिए वह न्यायकारी है, वह सब से प्रेम करता है और पक्षपात से रहित है| मजहब में पक्षपात बहुत है| भगवान का ही नियम चलता है तो हम वेद पर चलें|

ओ३म् श्रुधि श्रुत्कर्ण वह्निभिर्देवैरग्ने सयावभिः । आ सीदन्तु बर्हिषि मित्रो अर्यमा प्रातर्यावाणो अध्वरम् ॥ (ऋग्वेद मंत्र १/४४/१३)

(श्रुधि श्रुत्कर्ण) सुनने वाले, सुनने में समर्थ, आपके कान हैं| आप सुन रहे हैं आपको श्रुत्कर्ण कहा है| ईश्वर ने भगवान ने कई मंत्र में कहा है कि वेद वाणी सुनो| इधर-उधर की बातें मत सुनो| गुरू का शब्द लगा मोहे मीठा पारब्रह्म पाहे मोहे.. इसके लिए इंद्रियों का संयम करना पड़ेगा| इंद्रियां फिल्मों में जा रही हैं, गानों में जा रही हैं, कोई ताश खेल रहा है, जुआ खेल रहा है – कोई कुछ कोई कुछ| 

इंद्रियों का संयम करने के लिए शुद्धीकरण और अष्टांग योग विद्या –  यम, नियम, आसन, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि तक सीखो| यह शरीर मिला इसीलिए है| इस मनुष्य के शरीर से आसन प्राणायाम सब होगा, यज्ञ होगा, सेवा होगी लेकिन मगरमच्छ, मछली, कुत्ता, बिल्ली आदि इस मार्ग पर कैसे चलेंगे? कोई भी प्राणी इंसान के अलावा वेद मार्ग को समझ नहीं पाएगा| ईश्वर ने यही कहा कि सिर्फ तुम लोग ही इसको समझ पाओगे| इसलिए सेवा करो, साधना करो और सुनने में समर्थ प्राणी (वेद) सुनो|

(अग्नि) ईश्वर जो विद्या का प्रकाशक है| आप प्रीति के साथ (सयावभिः) जो जानने वाले हैं – सदाचार के बाद धारणे वाले मनुष्य आदि जो हैं| (देवै:) जो विद्या को जानने वाले हैं, दिव्य गुण वाले हैं| (अस्माकं) हम लोगों की वार्ताओं को सुनें| तुम और हम लोग मित्र हैं| (अयर्मा) – न्यायाधीश| प्रतिदिन पुरुषार्थ के साथ (अध्वरं) हिंसा रहित यज्ञ को प्राप्त होकर (बर्हिषि) उत्तम व्यवहार को (आ सीदन्तु) प्राप्त होयें| 

इसमें शिक्षा दी है कि हम भगवान की बातों को सुने और धार्मिक मनुष्य हो जाएँ| वे वेद सुनते हैं और न्याय की बात करते हैं, ऐसे महापुरुषों को राज्य के काम में लगना चाहिए| पहले जमाने में श्रीराम, हरिश्चंद्र, दशरथ आदि – यह सब धार्मिक पुरुष थे| तो राज्य कार्य में जो मनुष्य लगे वह धार्मिक हो| विद्वान लोग शिक्षा से युक्त अपने सेवकों को भी वेद सुनने की प्रेरणा दें| 

आलस्य का त्याग करके, पुरुषार्थ करते हुए, हवन ना छोड़ो और यज्ञ ना छोड़ो| जो छोड़ता है वो आलस्य में छोड़ता है| इस चीज को रोकना है| 

दिल क्यों नहीं करता है? दिल जो है वो रजोगुण तमोगुण सतोगुण वाला है| आपने इन तीनों को नाश करना है| इसमें मत फंसों और पुरुषार्थ करके यज्ञ करो| 

अगर यज्ञ नहीं करोगे तो इसके बिना निश्चय ही आपकी मेहनत सिद्ध नहीं होगी| जैसे आप मकान बनवा रहे हो, या कोई भी काम कर रहे हो तो बड़ी मुश्किल से ही होगा लेकिन आप यज्ञ करते हो तो फटाफट होगा और निर्विघ्न होगा| यह वेद मंदिर कितनी जल्दी बना| शिष्यों ने मेहनत करके इससे पुण्य कमाया है| 

आप निरंतर पुरुषार्थ करें पर यज्ञ के बिना सुख सुख शांति नहीं मिलेगी| फिर जिंदगी में क्या जीना है? आपके घर में ईश्वर का नाम नहीं गूँज रहा है तो यह सब राक्षसों की जूठन होती है| 

ओ३म् प्रियमेधवदत्रिवज्जातवेदो विरूपवत् । अङ्गिरस्वन्महिव्रत प्रस्कण्वस्य श्रुधी हवम् ॥ (ऋग्वेद मंत्र १/४५/३)

(श्रुधी हवम्) यह कान दिए हैं वेद सुनने के लिए पर यह काम क्रोध पुरुष को इस तरफ लगने नहीं देते| यह विद्या है क्या कमाल की है|

मेरा ध्यान उसी प्रश्न में जा रहा है| जो मैं समझा रहा हूं कि ऋषि लोगों के साथ ऐसा कुछ हादसा नहीं हुआ| विश्वामित्र श्री राम को मांगने के लिए राजा दशरथ के पास चले गए| गुरू वशिष्ठ ने राजा दशरथ कहा कि हे राजन! तुम राम को विश्वामित्र को दे दो| इनकी रक्षा में राम को कोई कुछ नहीं कर सकता है और यह खुद राक्षसों को मारने के लिए समर्थ है पर इन्होने ब्राह्मण रूप धारण कर लिया है| अब यह नहीं मार सकते हैं| जितने भी ऋषि मुनि थे वह इस सोच में थे कि हम ब्राह्मण हैं हम इन से लड़ेंगे नहीं पर राजा रक्षा करें| यही आज भी नियम है| वह प्रजा का पालन पोषण करें| 

उस समय का वृतांत है तो उस समय के अनुसार अर्थ करने होते हैं| कोई भी मदद के लिए सब राजा के पास ही जाते थे| इसके बाद जो हुआ है वह आपको मैंने कई बार सुनाया है| 

ईश्वर कृपा से सब ठीक है| कर्म मिथ्या नहीं जाते हैं| मैं अभी भी जरूरत से ज्यादा मेहनत करता हूँ|

सुबह उठकर जो भी ऋचा की कामना करते हैं, वेद मंत्रों में एकदम अनुरक्त हैं, आसन में बैठकर हवन करते हैं, आसन प्राणायाम करते हैं तो ईश्वर स्वयं उनका मित्र हो जाता है| 

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