अनुष्ठान में किसी किसी मंत्र की व्याख्या होती है| पांचवे सूक्त का पहला मंत्र कहता है कि अधर्म के  नाश व पाप से दूर होने से ही ईश्वर प्रसन्न होता है|  इसका हमें ध्यान देना चाहिए|  मार्ग तो यह ही है – प्रार्थना स्तुति से आहुति| उसमें शिक्षा भी आ रही है कि अगर हम पाप और बुराई नहीं छोड़ेगे तो आहुति हमें लाभ नहीं देगी| जीवन में पुण्य को उतारा जाता है और पाप का नाश किया जाता है|  पाप यज्ञ में ही सेवा, भक्ति व श्रद्धा से नष्ट होते हैं| वेद वाणी जीवन में सुख देती है और पापों का नाश करती है|  

स्तोमवाहसह – जिसके अंदर वेद प्रकट हैं| जो विद्वान को सुख देते हैं – विद्वान सखा हो जाता है और मित्र भाव रखता है| हे विद्वान लोगों! हम सब प्रीति से विद्वान से मुक्ति की विद्या  सिद्ध करें और हम खुद विद्वान होकर मुक्त हो जाएं| 

भगवान् देख रहा है सब पुण्य व पाप इसलिए हम पुण्य ही करें पाप नहीं| मुक्ति हमारा लक्ष्य है| लक्ष्य एक आयु में नहीं मिलता, बिरला ही कोई पाता है| इसके लिए कई जन्मों का तप चाहिए| पर इस जन्म में क्या चाहिए उसको सिद्ध करो| इस जन्म में हम सिर्फ देवयान मार्ग में आ जाएं बस| 

इस जन्म में वेद सुन सुनकर, सेवा कर कर, श्रद्धा रखें, वेद सुने, उस पर चलें – वो देवयान मार्ग पर आ जाते हैं| एक बार अगर देवयान मार्ग पर आओगे फिर कभी भटकोगे नहीं| पितृयान मार्ग मोह ममता वाला वेद विरुद्ध मार्ग है| 

आहार निद्रा भय मैथुन – खाना, पीना, सो जाना और संतान उत्पत्ति करना ये जानवर भी करते हैं| ये चार जानवरों के भी काम हैं और मनुष्यों के भी| सिर्फ धर्म हमें इनसे अलग करता है| धार्मिक मनुष्य उसको कहते हैं जो वेद के अनुसार कर्म करता है| पापी वेद के विरुद्ध काम करते हैं| इंसानों ने मज़हब को धर्म कहा है| हम धर्म युक्त कार्य करें|

देवयोनि में जो भी आ जाता है वह अगले जन्म में योगिओं के कुल में पैदा होता है| समाधी प्राप्त विद्वान अगले पाँच जन्मों तक रक्षा करते हैं कि शिष्य को योगाभ्यास आदि कराके मोक्ष की ओर चले| विशेषता इस बात की है कि हम पितृयान मार्ग में न जाएँ| 

पितृयान मार्ग ऐसा है जैसे किसी पक्षी ने अण्डा दिया और उसके बच्चे हुए| फिर उसके माता पिता मर गए| फिर वो बच्चे बड़े हुए और यह क्रिया चलते रहना पितृयान मार्ग है| 

मनुष्य धर्म पर चलता है| धर्म का मतलब वेदों में कहे हुए कर्त्तव्य कर्म| वेदों में कहे हुए शुभ कर्म को आचरण में लाना है वो धर्म है|  सारांश यही है कि किसी न किसी तरह वेद मार्ग पर चलकर हमें मोक्ष प्राप्त करना है| विद्वान की महिमा जानने वाला जो है, वो ईश्वर की महिमा जानकार, धार्मिक पुरुष बनकर, मोक्ष प्राप्त करते हैं|  

अन्न पचना, अन्न पकना, लोहे से औजार बनाना यह सब अग्नि के कार्य हैं| 

गुरूभक्ति के बिना कुछ नहीं है| मोक्ष सिद्ध करने के लिए आपकी साधना और तपस्या स्थिर हो| हम दोनों मार्ग में तरक्की करें – भौतिक और आद्यात्मिक| 

इन्द्रम् – ये जो ईश्वर है और बिजली (दोनों)|हम इंजीनियरिंग और ईश्वर को प्राप्त करें| विद्वान ईश्वर के गुणों का उपदेश करें और आप गुणों को सुनते रहो| आप विद्वानों से नहीं सुने तो बड़ा पाप हो जाएगा| पूरा विश्व देख लो आज| पहले पूरे विश्व के सम्राट और स्वराट् होते थे

स्वराट् अपनी मर्ज़ी से निर्णय लेता था| उसके निर्णय को सम्राट स्वीकार करता था तथा लागु करता था| स्वराट् के नियम प्रजा को सुख देते थे| स्वराट् ऋषि मुनि होते थे| आज तो धर्म सभा भी नहीं है और स्वराट् भी नहीं है| 

ईश्वर के गुणों का उपदेश करें| ईश्वर और विद्वान के गुण गाओ| वेद के गुण गाओ| ईश्वर कहता है कि विद्वान के बिना न तुम वेद जानपाओगे न मुझे| और क्यों सुने? क्योंकि अच्छी तरह यह वेद विद्या स्थिर रहे| आज भी लोग इन्द्रियों के सुख लेने के लिए वेद छोड़ देते हैं| जो इन्द्रियों का सुख लेते हैं जैसे देर तक सोना, खेलना-कूदना, वेद पर ध्यान न देना| 

वेद पर ध्यान न देकर आज मनुष्यों ने आज काम क्रोध आदि में समय लगाया हुआ है| भगवान् कह रहा है कि चारों और इसको फैलाओ, प्रचार करो, इसको मनुष्यों को सुनाओ| अगर अभ्यास (practice) नहीं करी तो बिलकुल याद नहीं रहेगी| आपने भी जो भौतिक विद्या की प्रैक्टिस नहीं की वो आपको याद नहीं| यह पॉइंट ईश्वर ने यहाँ कहा कि विद्या को लोगों को सुनाओ ताकि विद्या जीवित रहे| 

सुख इसी प्रकार मिलेगा| अगर आप इसका प्रचार करते ही रहोगे, बोलते ही रहोगे तो यह आपको याद भी रहेगी और आपको सुख भी देगी| सामवेद में कहा है कि विद्वान लोग गायन करें| भगवान् ने सारे सुख इस वेदवाणी में भर दिए हैं और हम ऋषि मुनि के मुख से सदा इसको सुनते आये हैं| अब यह काम क्रोध मोह माया की मुसीबत महाभारत के बाद आई पड़ी है कि सारे विद्वान आश्चर्य चकित हैं| गुरू के बिना जीवात्मा तो भटकी हुई है| जीवात्मा को जीव के बिना कोई सहारा नहीं दे सकता| ये बीमारियां कर्मानुसार आती जाती हैं| कोई ब्रह्मर्षि, मुनि, तपस्वी संकल्प कर लेता है तो ईश्वर सारी शक्ति दे देता है| इस मन्त्र में भी ईश्वर कह रहा है कि ईश्वर के गुणगान गाओ और सुनाओ दुनिया को और दुनिया को कहा कि सुनना कम न कर देना| 

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