स्वामी राम स्वरूप जी, योगाचार्य, वेद मन्दिर, योल

आज विज्ञान चहुमुँखी उन्नति की ओर अग्रसर है। आकाश, समुद्र एवं पृथ्वी पर उसका राज्य सा विद्यमान है। यह एक प्रसन्नता का विषय है। यजुर्वेद मंत्र 40/41 में ईश्वर ने स्पष्ट किया है कि मनुष्य भौतिक उन्नति (विज्ञान) एवं आध्यात्मिक उन्नति, दोनों को साथ-साथ करे। इस मन्त्र पर यदि विशेष ध्यान दिया जाए तो यह कहना अनुचित नही होगा कि जहां पानी की लहरों को चीर कर हमारे जहाज़ सम्पूर्ण विश्व का भ्रमण करते है और आकाश में हम उड़ते फिरते है वही पृथ्वी पर संभलकर चलना हमने आज तक नही सीखा। हमने वेदानुसार विज्ञान एवं आध्यात्मिक उन्नति को प्रायः नजरअन्दाज किया है। यही कारण है कि जहां पर मनुष्य पृथ्वी पर भौतिक उन्नति किए जा रहा है वही वह दुःख, परेशानी, विभिन्न प्रकार के रोग आपदाएँ, मानसिक रोग, शारीरिक कष्ट आदि से सदा ग्रस्त रहता है और प्रायः भ्रष्टाचार और अंधविष्वास आदि अनेक कुरीतियों का शिकार है।

यह प्रसन्नता का विषय है कि विज्ञान आज सृष्टि रचना और प्राणी के अस्तित्व आदि के विषय में भूमि के अन्दर 100 मीटर गहराई तथा 27 किलोमीटर लम्बाई में परीक्षण कर रहा है उसे कुछ परिणाम भी प्राप्त हुऐ होंगे। 

एन्ट्रोपी लाॅ के अनुसार भी वैज्ञानिकों ने सूर्य की आयु का ज्ञान प्राप्त किया है। यदि मेरा अनुमान गलत नहीं तो वैज्ञानिकों के प्रत्येक विष्लेशण/फल आदि परिवर्तित होते रहे है। ईश्वर करे कि इन्हें वेदानुसार स्थिर आँकड़ें प्राप्त करने में विजय प्राप्त हो। यहाँ यह कहना अनुचित न होगा कि यह सृष्टि अनादि काल से बनती, बिगड़ती आई है और सृष्टि क्रम में ही यजुर्वेद मन्त्र 31/7 के अनुसार अपौरूशेय वेदों की उत्पति ईश्वर से होती है और यह वेदों का ज्ञान ईश्वर की सामर्थ्य द्वारा चार ऋशियों के अन्दर प्रकट होता है। यह विषय गम्भीर है अतः यहाॅं मैं अभी कुछ नही कहॅूंगा। बस इतना ही कहता हूं कि वेद ईश्वरीय वाणी है और वेदों मे अनन्त ज्ञान, विज्ञान, कर्म एवं उपासना आदि का रहस्य छुपा हुआ है और आजतक जो सृष्टि में ज्ञान विज्ञान हो रहा है, वह पूर्णतः वेदानुकूल है अर्थात् इसका वर्णन ईश्वर ने प्रथम ही वेदों में किया हुआ है परन्तु हमारा दुर्भाग्य है कि अब हम विद्वानों से वेद विद्या नही सुनते।

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सृष्टि रचना का उपदेश करते हुए यजुर्वेद के निम्नलिखित मंत्र में कहा कि परमात्मा से चारों वेद उत्पन्न हुए हैः

तस्माद्यज्ञात्सर्वहुत ऋच: सामानि जज्ञिरे। 

छन्दांसि जज्ञिरे तस्माद्यजुस्तस्मादजायत॥ (ऋग्वेद मंत्र १०/९०/९)

अर्थात यह जगत् सूर्य-चाँद, पशु-पक्षी एवं नर-नारी उत्पन्न करने के पश्चात् उस परमात्मा से ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद, अर्थवेद उत्पन्न हुए। यह कटु सत्य है कि परमेश्वर ही पूर्ण पुरूष है और उससे ही यह जगत एवं मानव कल्याणार्थ चारों वेदों के रूप में पूर्ण विद्या निकली हैं। वेदों की उत्पत्ति का रहस्य समझने से पहले वेदों में कही सृष्टि उत्पति का रहस्य समझना परमावष्यक है। ऋग्वेद के मंडल 10 सूक्त 129 में कहा गया है: 

नासदासीन्नो सदासीत्तदानीं नासीद्रजो नो व्योमा परो यत्। 

किमावरीव: कुह कस्य शर्मन्नम्भ: किमासीद्गहनं गभीरम्॥ (ऋग्वेद मंत्र १०/१२९/९)

इन मंत्रों का भाव यह है कि जब इस वर्तमान सृष्टि की रचना नहीं हुई थी जब केवल एक सर्वशक्तिमान परमेश्वर  ही था। उस प्रलय अवस्था में सत्य अर्थात शून्य (आकाश) जो नेत्रों से नहीं दिखता वह भी नहीं था। उस समय में रज, तम एवं सत्त्व गुण युक्त प्रकृति भी अपने अव्यक्त रूप में थी। अर्थात् ईश्वर शक्ति द्वारा प्रेरित होकर प्रकृति संसार रचने को अभी प्रवृत नहीं हुई थी। इसी स्थिति को इस मंत्र ने कहा ‘ना सत् आसीत् अर्थात् तीनों गुणों युक्त प्रकृति से संसार रचने के लिए ईश्वर की स्वभाविक क्रिया जिसे ईक्षण कहते है, वह अभी हरकत में नही आई थी। यजुर्वेद मंत्र 23/54 में इस स्वाभाविक क्रिया (ईक्षण) के विषय में कहा है द्यौः पूर्वचित्ति अर्थात् जो अति सूक्षम विद्युत शक्ति है, वह सृष्टि रचना में प्रथम परिणाम है। परमवेश्वर की इस प्रथम परिणाम रूपी स्वाभाविक क्रिया (ईक्षण) को ही इन मंत्रों में कामः (संकल्प) कहा। एतरयोपनिशद् में ‘सः इक्षत लोकान्नु सृजा इति’ अर्थात उस परमात्मा में ईक्षण (विचार) हुआ कि लोकों को रचूं। भाव यह है कि सृष्टि रचना से पहले परमेश्वर से अतिरिक्त मंच में आभु नाम से कहीं अव्यक्त प्रकृति थी, न आकाश था। उस समय परमाणु भी नहीं थे और न ही विविध पदार्थों से प्रकाशमान ब्रह्मांड रूप जगत का निवास स्थान ही था। अर्थात् अंतरिक्ष भी नहीं था। उस समय मृत्यु भी नहीं थी। क्योंकि जीवन भी नहीं था एवं शरीरादि बने ही नहीं थे।

दिन-रात्रि भी नहीं बने थे। गहन और गंभीर समुद्र का जल भी नहीं था। केवल परमात्मा एवं ‘आभु’ नाम से अव्यक्त प्रकृति थी। उस समय असंख्य चेतन जीवातमाएं भी थी, जो पूर्वजन्म में किए कर्मो का संस्कार लिए हुए कर्मफल अनुसार निष्कृष्ट अथवा उत्कृष्ट योनी में परमवेश्वर की व्यवस्थानुसार जन्म लेने वाली थी। रज तम एवं सत्त्व गुणों की साम्यावस्था का नाम प्रकृति है, जिससे जगत बनता है। मंत्र में कहे कामः (संकल्प) अर्थात् ईश्वर में स्वाभाविक क्रिया (ईक्षण) के उठते ही प्रकृति के तीनों गुण (रज, तम, सत्त्व) मिलकर सृष्टि रचने को तत्पर हो जाते हैं। तब इस अवस्था में यह तीनों तत्व मिलकर ‘प्रधान’ कहलाते है। अब प्रकृति से जो पहला तत्त्व सृष्टि रचना में बनता है, उसका नाम महत् तत्त्व है, जिसे बुद्धि भी कहते हैं। अब सृष्टि सर्ग प्रारंभ हो चुका होता है। अतः महत् से अहंकार, अंहकार से पांच तंन्नमात्राएं और दसों प्रकार की इन्द्रियाँ (पांच ज्ञापनेद्रियाॅं, पांच कर्माेंद्रियाॅं और एक मन) तथा आकाश, वायु, जल, अग्नि एवं पृथ्वी वह पांच स्थूल भूत उत्पन्न होते हैं। इस प्रकार ईश्वर के ईक्षण मात्र से अवयक्त प्रकृति द्वारा यह जगत उत्पन्न हो जाता है। 

ऋग्वेद के दसवें मंडल के युक्त 120 के चार व पांचवें मंत्रानुसार उस महान सबके पूजनीय परमेष्वर ने पंच महाभूतों से मानव शरीर बनाया और उसमें इच्छा भाव उत्पन्न हुआ। छठे मंत्र में वेद प्रश्न करता है कि जड़ जगत एवं जीवात्माओं को शरीर की रचना के विषय में कौन जानता है? और कौन इस रहस्य को कह सकता है? वेद का यह प्रश्न बड़ा जटिल है, परंतु उत्तर भी स्पष्ट है कि अभी तक यहां परमेश्वर ने, भौतिक जगत की रचना एवं मानव शरीर रचकर यह रहस्मयी रचना किसी पर भी प्रकट नही की है। सभी विद्वान सृष्टि रचना के पश्चात् ही होते हैं।

यह एक तथ्य है कि प्रत्येक वर्तमान धर्म अपने धार्मिक ग्रन्थों द्वारा ही सत्य-असत्य का प्रमाण प्रस्तुत करता है। यह भी सब विश्व मानता है कि विश्व के पुस्तकालयों (ब्रिटेन में भी) में सबसे पुरातन ग्रन्थ चार वेद ही हैं। यजुर्वेद मन्त्र 31/1, ऋग्वेद 10/129/1-6 तथा सामवेद मंत्र 617 तथा अथर्ववेद काण्ड 19 सूक्त 6 स्वयं कह रहे हैं कि वेद ईश्वर से उत्पन्न अलौकिक ज्ञान है, जिसमें कोई वर्तमान के धर्मों अथवा जातिवाद का वर्णन क्षणिक भी नहीं  है, अतः सब मानव एक ईश्वर की संतान है और सबको प्रेम, भाईचारे से रहने का ईश्वर का आदेश है। मनुस्मृति धार्मिक ग्रन्थ है, जिसके अनुसार वर्तमान सृष्टि का यह सातवाँ मनवन्तर है। इससे पहले 6 मनवन्तर बीत चुके है।

यह है-स्वायम्भुव, स्वारोचिस, औत्त्मी, तामस, रैवत, चाक्षुष – यह छह बीत चुक है और सातवाँ-वेवस्वत मनवन्तर चल रहा है। 71 चतुर्युगियों का नाम एक मनवन्तर है। सत्रह लाख, 28 हजार वर्ष का एक सतयुगः बारह लाख 96 हजार का त्रेता, आठ लाख 64 हजार वर्षों का द्वापर और चार लाख 32 हजार वर्षों का कलियुग। इन चार युगों का योग 43 लाख बीस हजार हुआ जो एक चतुर्युगी हुई। ऐसी 71 चतुर्युगियां अर्थात् तीस करोड़, 67 लाख, 20 हजार वर्षों का एक मनवन्तर है और ऐसे 6 मनवन्तर अब तक बीत चुके है। इस चतुर्युगी के कलियुग के लगभग 5 हजार से अधिक वर्ष बीत चुके है। अतः अब तक पृथ्वी तथा वेदों को बने, एक अरब 96 करोड़ 8 लाख 53 हजार दो वर्ष बीत चुके हैं। इस समय का कुछ-कुछ वर्णन गीता के श्लोक 8/17 में भी है। इस काल गणना का विस्तृत वर्णन मनुस्मृति श्लोक 1/64 से 1/80 तक पूर्ण रूप से किया गया है। उस पृथ्वी पर वर्तमान धर्म अथवा जातिवाद अथवा वर्तमान की पूजा पाठ नहीं थी। इन्ही धर्मग्रन्थों से यह पूर्णतः प्रामाणिक है कि उस समय हिन्दु शब्द भी किसी ग्रन्थ में नही था। यजुर्वेद अध्याय 31, ऋग्वेद मंडल 10 सूक्त 129, सामवेद 617, अर्थवेद काण्ड 19 सूक्त 6 में यह रचना एक ही ईश्वर द्वारा है। और मुनस्मृति 1/21 में भी कहा कि गऊ, अश्व  इत्यादि नाम, उस परमात्मा ने वेद से लेकर रचे। मनुस्मृति श्लोक 1/136,141; 2/17 के अनुसार भी पूरी ‘‘सृष्टि में मनुष्य का पहला जन्म तिब्बत में हुआ। 

चारों वेदों के अनेक मंत्रों में सृष्टि रचना का वर्णन है। यजुर्वेद का सम्पूर्ण अध्याय 31, सामवेद के मंत्र 617 से 627 ऋग्वेद मंत्र 10/90/1-13 तथा अथर्ववेद काण्ड 19 सूक्त 6 में मूल प्रकृति के रज, तम एवं सत्व, इन तीन गुणों से सम्पूर्ण जड़ जगत की रचना का वर्णन मिलता है। यजुर्वेद मंत्र 23/1 में कहा कि पिछली सृष्टि प्रलय को प्राप्त होकर नष्ट हो जाती है तब सब चेतन जीवात्माएं शरीर रहित मूर्छित अवस्था में वि़द्यमान होती है और यह सूर्य-चन्द्रमा, पेड़-पौधों एवं मनुष्य तथा पशु-पक्षी के समस्त शरीर भी नष्ट होकर प्रकृति के मूल स्वरूप में समा जाते हैं अर्थात् ऋग्वेद मंत्र 10/129/1 के अनुसार यह दिखने वाली पृथ्वी शरीर आदि तत्व कुछ भी नही रहता अर्थात दिखाई देने योग्य कुछ नही होता। अपितु इस समय प्रकृति अपनी मूल अवस्था में होती है अर्थात् रचना करने योग्य नही होती। इस मूलावस्था का सुन्दर वर्णन मुनि कपिल ने अपने सांख्य शास्त्र सूत्र 1/26 मे कहा-

सत्वरजस्तमसां साम्यावस्था प्रकृतिः प्रकृतेर्महान् महतोऽहङ्गारोऽहङ्कारात् पञ्च तन्मात्राण्युभयभिन्द्रियं तन्मात्रेभ्यः।

अर्थात् सत्व, रजस, तमस् यह तीन गुण प्रकृति के हैं। जब यह तीन तत्व पृथ्वी के पदार्थ रचने की अवस्था में नहीं होते तो इन तत्वों की इस साम्यावस्था का नाम ही प्रकृति है। जब प्रकृति अपने इस मूल स्वरूप में होती है, तब इसे ही प्रलयावस्था कहते है जिसके विषय में ऊपर ऋग्वेद मंत्र में कहा कि इस प्रलयावस्था में देखने योग्य कुछ भी नही होता। यजुर्वेद मंत्र 23/54 एवं ऋग्वेद मंत्र 10/129/3 में स्पष्ट किया है कि ईश्वर की एक अंश मात्र शक्ति  ने इस जड़ प्रकृति से जगत उत्पन्न किया। अर्थात् यजुर्वेद मंत्र 31/3 के अनुसार यह तीनों लोक अर्थात् सूर्य, चन्द्रमा आदि द्युलोक अन्तरिक्ष एवं पृथ्वीलोक ईष्वर के चर्तुथ अंश के समान भी नहीं है। भाव यह है कि ईश्वर सम्पूर्ण जगत में व्यापक है और सूर्य-चन्द्रमा आदि की रचना और सब ग्रहों अन्तरिक्ष (खाली स्थान) में घूमना, जन्म-मृत्यु आदि का होना इत्यादि ईश्वर के इन आश्चर्ययुक्त कर्मो (ईक्षण) को देखकर यह अनुमान होता है कि ईश्वर कितना महान है। और वास्तव में विद्वान लोग भी यह रचना देखकर दाँतों तले अंगुली दबा लेते है और पूर्व एवं वर्तमान के केवल भौतिकवाद को बढ़ावा देने वाले, वैज्ञानिक भी इस रचना की गहराई तक अभी पहुंच नहीं पाए हैं और न ही पहुंचने की संभावना है। अतः सृष्टि रचना को देखकर मनन करके आष्र्चयुक्त होकर कहना पड़ता है कि ईश्वर अत्यधिक महान् शक्तिमान है। परन्तु प्रस्तुत मंत्र इससे भी अधिक आश्चर्ययुक्त बात कह रहा है कि यह रचना आदि तो ईश्वर के लिए कुछ भी नही है। यह सब ईश्वर के चतुर्थ अंश के समान भी नहीं है। अतः ईश्वर तो इससे भी अधिक महान है। तब यजुर्वेद के मंत्र 40/4 का भी अनायास ही स्मरण हो जाता है कि इस सर्वषक्तिमान रचनाकार ईष्वर को भुलाकर सूर्य शरीर पेड़-पौधे आदि असंख्य पदार्थों के विषय में विज्ञान की मन बुद्धि के चिंतन द्वारा जो खोज हो रही है, वह प्रायः निष्फल ही कही जाएगी क्योंकि प्रस्तुत मंत्र ईश्वर की शक्ति और पूर्णतः पदार्थों की खोज को केवल मन, बुद्धि द्वारा प्राप्त करने में असफल सिद्ध करता है। क्योंकि मंत्र कहता है कि ईश्वर और ईश्वर की रचना को ‘‘नैनत् देवाः आप्नुवन्’’ आदि अंधकार (क्लेष) एवं दुःखों में डूबने का साधन मात्र कहता है और यही कारण है कि आज सम्पूर्ण विश्व में भ्रष्टाचार नारी अपमान उग्रवाद एवं परमाणु युद्ध आदि खतरों सहित असंख्य विपदाओं की प्रचण्ड आंधी अन्तरिक्ष में उफान लिए खड़े हंै और कब तीसरा विश्व युद्ध मानवता के लिए खतरा उत्पन्न कर दे, इसका कोई पता नही। परन्तु वेद में भगवान ऐसी भौतिक उन्नति को नकारता भी नही है क्योंकि संसार के इन सब पदार्थों का ज्ञान सर्वप्रथम तो ऋग्वेदादि में स्वयं ईश्वर ने खोज करने एवं मानव कल्याण के लिए ही दिया है और जब-जब इन पदार्थों की (विज्ञान) खोज ईश्वरीय प्राणी चारों वेद के अनुसार हमारे पूर्व के व्यास आदि ऋशियों ने आध्यात्मिकवाद सहित की तब पिछले तीनों युगों में सदा मानवता का कल्याण ही हुआ था और वाल्मीकि रामायण एवं महाभारत आदि ग्रन्थों के अध्ययन से पता चलता है कि उस समय का विज्ञान ऋशियों की कृपा से आज से कई गुणा अधिक उन्नत स्तर पर था। 

अब समस्या यह है कि सृष्टि रचना में आज वैज्ञानिक आंकड़ें ईष्वरीय वाणी वेदों से ज्यादा नही मिलते तो किस पर विश्वास किया जाये। विज्ञान पर या ईश्वरीय वाणी वेदों पर अथवा उन पुरातन ऋशि मुनियों पर जिन्होंने सांसारिक सुख त्याग कर जंगलों में तप के द्वारा हड्डियाँ सुखाकर वेदानुसार सत्य को दर्शाया था और वह सत्य महाभारत, ग्रन्थ, वाल्मीकि, रामायण, षतपथ ब्राह्मण ग्रन्थ, नरूक्त ग्रन्थ आदि में तथा छः शास्त्र, 11 उपनिशद आदि में अभी भी सुरक्षित है। हम प्रार्थना करें कि आज के वैज्ञानिक वेद विद्या को भी साथ लेकर आध्यात्मिकवाद में भी उन्नति करते हुए मानव कल्याण के लिए विज्ञान को और भी अधिक ऊचाँ ले जाये।

यहाँ यह विचार लिखना भी अनिवार्य है कि विश्व के प्रायः सभी बुद्धि जीव वेदों को संसार का सबसे पुरातन ग्रन्थ मानते है। प्रत्येक पुरातन व वर्तमान के ऋशियों ने इस ईश्वर से उत्पन्न ज्ञान के सम्मुख अपना मस्तक झुकाया है।

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