यदि देष और विष्व में षांति स्थापना और भाईचारे को बढ़ाना है तो हमें पूर्व काल की भांति विष्व की सनातन वैदिक संस्कृति की रक्षा एवं इसके प्रचार-प्रसार की ओर ध्यान देना होगा, जिस संस्कृति ने पिछले सभी युगों की जनता को प्रेम के एक सूत्र में बांधकर रखा था। क्योंकि ईष्वर से उत्पन्न वैदिक संस्कृति सभी प्रकार के भेदभाव से रहित, समान रूप से मानव जाति के लिए कल्याणकारी है और यह मज़हब नहीं है। हम मनुश्यों द्वारा बनाए मज़हबों में स्वार्थ और पक्षपात आदि दोश देखे जा सकते हैं परन्तु सबका जो एक पिता परमेष्वर है उससे उत्पन्न वेद विद्या में पक्षपात, अन्याय, स्वार्थ अथवा किसी भी प्रकार की कमी की कल्पना नहीं की जा सकती। यह अवष्य है कि सभी वर्गों के मनुश्यों को यह सिद्ध करने के लिए कि-वेद ईष्वर से उत्पन्न वाणी है, इसके लिए गौतम ऋशि के न्याय षास्त्र सूत्र 1/1/40 के अनुसार आपस में प्रेमपूर्वक एक साथ बैठ कर, एक लम्बी अवधि तक तर्क-वितर्क, विचार-विमर्ष करने की आवष्यकता है। गौतम ऋशि ने स्पश्ट कहा है कि जो सिद्धांत को जानने के लिए विचार किया जाता है, उसी का नाम तर्क है। इसी विशय में ऋग्वेद मंत्र 10/191/2 एवं 3 का भी यही भाव है कि मनुश्यों में अलग-अलग दल नहीं होने चाहिए। किन्तु सदा एक सूत्र में बंध जाएँ, मिलकर रहें। जिससे सब आपस में सम्वाद कर सकें, एक-दूसरे के दुःख एवं सुख तथा अभिप्राय को सुन सकें। सब मनुश्यों का समान विचार, कार्य प्रवृत्ति समान, मन, चित्त एक समान होने चाहिए। आज वेद-षास्त्रों की षिक्षा का पृथिवी पर प्रायः पूर्णरूप से अभाव दिखाई देता है जिसके फलस्वरूप मनुश्यता एक सूत्र में नहीं बंध पा रही। इसके लिए हम सबको प्रेमपूर्वक आपस में मिलकर प्रयत्न करना होगा। प्रायः प्रत्येक मज़हब भी हमें यही षिक्षा दे रहे हैं परन्तु ऐसी उत्तम षिक्षाओं को आचरण में लाने के लिए हमें आपस में बैठकर प्रयास करना ही होगा। अतः तर्क लड़ाई-झगड़ा नहीं है। इससे मज़हब में कोई फर्क नहीं आएगा, सब अपने-अपने मज़हब पर चलें और सभी प्राणी एक-दूसरे के मज़हब का आदर करें। परन्तु जब सभी मज़हबों में परस्पर भिन्नता प्रत्यक्ष दिखाई देती है तब स्वाभाविक ही है कि अनादिकाल से ऋशि-मुनियों से उच्चारण की गई वेदविद्या और वर्तमान में मनुश्यों द्वारा 2-2.5 हज़ार वर्शों में उत्पन्न मज़हबों में कुछ न कुछ अन्तर तो रखना ही पड़ेगा।

उदाहरणार्थः- मुस्लिम धर्म में गऊ माँस खाने का विधान है परन्तु हिन्दु धर्म में नहीं है। प्रायः प्रत्येक मज़हब की भाशा एक-दूसरे से भिन्न है, इत्यादि। हाँ! यह अवष्य है कि हम सभी भाशाओं का आदर करते हैं, भाशा अलग-अलग होने से भाईचारे में कोई अन्तर नहीं पड़ता। देखने में भी आता है कि भाशा कोई भी हो, प्रत्येक भाशा से प्रेम भरी मीठी-मीठी वाणी भी निकलती है और विपरीत में क्रोध भरी गाली-गलौच वाली अभद्र वाणी भी निकलती है। अतः यह तो मनुश्य के संयम और विवेक पर आधारित है कि वह अपनी भाशा को किस रूप में प्रयोग करता है।

इसी सनातन संस्कृति वेद ने गऊ को ‘‘विष्वस्य मातरः’’ अर्थात् ‘‘विष्व की माता’’ कहा है। यजुर्वेद मंत्र 28/6 में भी कहा ‘‘सुदुघे मातरा मही धेनू’’ अर्थात् कामना पूर्ण करने वाली माता के समान महान् दुधारू गऊ (वत्सम्) बछड़े को प्राप्त कराती है। मन्त्र से स्पश्ट है कि सब प्रकार का सुख देने वाली गऊ सब मनुश्य जाति के लिए माता के समान है। क्योंकि जिस समय सृश्टि रचना के आरम्भ में ईष्वर द्वारा वेद का ज्ञान उत्पन्न हुआ था, तब ईष्वर ने केवल मनुश्य उत्पन्न किए थे, मज़हब नहीं। अतः वेद मनुश्य जाति पर समान रूप से लागू थे, लागू हैं और लागू रहेंगे। अब यहाँ प्रष्न केवल तर्क का है, आपस में बैठकर प्रेमपूर्वक संवाद करने का है कि हम वेदों को ईष्वर से उत्पन्न ज्ञान मानें अथवा नहीं और साथ ही साथ ईष्वर की आज्ञा कि गऊ सब मनुश्यों की माता के समान है, इसे स्वीकार करें अथवा नहीं। हाँ! तर्क और संवाद में क्रोध और लड़ाई-झगड़े का तनिक सा भी वातावरण नहीं होना चाहिए। मानवता को एक सूत्र में बांधने के लिए ऐसे प्रयास करना आवष्यक हैं।

हम यहाँ यह कटु सत्य भी समझें कि मनुस्मृति के अनुसार पृथिवी की रचना हुए लगभग एक अरब 96 करोड़ से कुछ ज्यादा वर्श हो गए हैं। महाभारत काल तक (लगभग सवा 5 हज़ार वर्श पहले तक) सभी मनुश्य जाति ने, वेदों की षिक्षा को ग्रहण करते हुए, गऊ एवं पृथिवी को माता के रूप में स्वीकार किया था। जबसे मनुश्यों द्वारा लगभग 2-2.5 हज़ार वर्श के भीतर मत-मतान्तरों की उत्पत्ति हुई तब से मानवता का, पशुओं का हनन प्रारम्भ हुआ है। आज वैदिक ज्ञान में आई कमी के कारण जन्म देने वाले माता-पिता, वृद्धों आदि का ही अपमान करना, उन्हें बेटे-बहुओं आदि द्वारा घर से निकालकर वृद्ध-आश्रमों में पहुँचाना और इस प्रकार उनकी दुर्दषा करना एक आम सी बात हो गई है, जो महापाप है। तब सम्पूर्ण मानव जाति को परमेष्वर ने पषु धन के रूप में गऊ माता की सेवा करने का जो उपदेष दिया है वह आज की परिस्थिति में सबको कैसे हज़म हो सकता है?

अथर्ववेद मन्त्र 12/1/10 में पृथिवी की स्तुति कितने सुन्दर षब्दों में कही गई है कि जिस भूमि को दिन और रात्रि ने मापा है, जिस भूमि पर व्यापक सूर्य ने पाँव रखा है, जिस भूमि को वाणियों, कर्मों और बुद्धियों में चतुर, ऐष्वर्य वाले पुरुश ने अपने लिए षत्रु रहित किया है, वह भूमि हमारे हित के लिए मुझको अन्न-धन और विविध प्रकार के पदार्थ देवे। इस प्रकार देवे जैसे माता अपने पुत्र को अन्न, धन, दूध आदि देती है।

यह ईष्वर प्रदत्त पवित्र भूमि, जो सम्पूर्ण मानव जाति को अन्न, धन, जल, ऊर्जा, सोना-चाँदी, लोहा, फल-फूल, तेल, कोयला, फसल आदि अनेक पदार्थों को देकर समान रूप से मनुश्यों का माता के रूप में पालन-पोशण करती है और जिसे अथर्ववेद मंत्र 12/1/12 में कहा- (भूमिः माता) भूमि मेरी माता के तुल्य है और (अहम् पृथिव्याः पुत्रः) मैं पृथिवी का पुत्र हूँ, ऐसी सुखदायक पवित्र माता को भी ‘‘वन्दे मातरम्’’ अर्थात् मैं अपनी पृथिवी माता की वन्दना करता हूँ, ऐसा कहने से लोग हिचकते हैं। परन्तु रहते पृथिवी पर ही हैं और उससे सब सुख उठाते हैं। यह अहसान फरामोषी क्या ईष्वर को मन्ज़ूर होगी? कदापि नहीं। मज़हब के विशय में आज तक यही सुनते आए हैं कि मज़हब आपस में वैर-विरोध करना नहीं सिखाता और ना ही हिंसा फैलाता है। इस विशय में अथर्ववेद मंत्र 3/27/1 का उपदेष है- (यः अस्मान् द्वेश्टि) हे ईष्वर। जो हम सबके साथ द्वेश करता है और (यम् वयम् द्विश्मः) हम सब उसके साथ द्वेश करते हैं- प्रेम नहीं करते (तम् वः जम्भे दध्मः) वह हमारी और दूसरों की द्वेश करने की भावना समाप्त हो जाए।

अतः यहाँ परमेष्वर एक-दूसरे से राग-द्वेश करने वाले मनुश्यों की हत्या का उपदेष नहीं कर रहा अपितु राग-द्वेश की भावना को जड़ से समाप्त करने का उपदेष कर रहा है। अतः हम मज़हबों का आदर करें और राग-द्वेश की भावना को समाप्त करें, ऐसा रास्ता निकालें। परन्तु ऐसा कुछ देखने में नहीं आता। एक मज़हब दूसरे मज़हब वालों की हत्या करना पुण्य कर्म समझता है और अपने मज़हब वालों की हत्या करना पाप कर्म समझता है। वेद, षास्त्रों एवं ऋशि-मुनियों की भूमि पर मनुश्यों ने स्वयं यह निर्णय लेकर कोई बुद्धिमता का काम नहीं किया है अपितु ऐसे निर्णयों में अज्ञान एवं पक्षपात् पूर्ण रवैया ही दिखाई देता है जो मानवता के लिए खतरा है, मानवता में सभी मज़हब आ जाते हैं। अतः सभी मज़हब वालों को खतरा है। इस विशय में योग षास्त्र सूत्र 2/31 का वचन है कि अहिंसा सभी मनुश्यों, पशु-पक्षियों आदि पर एक समान लागू होती है।

व्यासमुनि जी कहते हैं कि ऐसा नहीं कि कोई कहे कि मैं मछली मारने की हिंसा करूँगा परन्तु अन्य किसी जीव पर हिंसा नहीं करूँगा, ऐसे विचार को वेद षास्त्रों ने नकारा है। यह कह कर नकारा है कि अहिंसा महाव्रत है और यह सब जीवों पर एक साथ लागू होता है। दुःख इस बात का है कि वर्तमान में मज़हब और जातिवाद आदि के झगड़ों ने मानवता पर कुठाराघात किया है। अतः आज सब मनुश्यों और सरकार से ऋशियों द्वारा ऊपर लिखी योग षास्त्र की षिक्षा पर विचार करने के लिए कौन कहे, कैसे कहे, कहाँ कहे, किस आषा से कहे, किस मुँह से कहे, किन अपनों से कहे कि अहिंसा धर्म सभी जीवों पर एक समान लागू होता है। अतः इन दोनों मुद्दों पर राजनीति की रोटियाँ सेंकना बुद्धिमता से परे की बात होगी। अपितु समाज में परोपकार के लिए हम ईष्वर के उपदेष को हृदय से और श्रद्धा से स्वीकार करते हुए पुनः गौ एवं पृथिवी को माता का स्थान देकर उसका मान बढ़ाएँ। इसी से ईष्वर प्रसन्न होगा, राश्ट्र सुदृढ़ बनेगा और भाईचारा बढ़ेगा। वस्तुतः सभी मज़हबों में भाईचारे का संदेष है। फिर प्रष्न उठता है कि आज एक मज़हब दूसरे मज़हब को उकसाने और हिंसा आदि होने पर बदला लेने को क्यों आतुर हो जाता है? यह मज़हब का कार्य है या किसी और का?

वस्तुतः यह कार्य मज़हब का नहीं, इंसान के दिमाग की उपज है। क्योंकि मज़हब में तो षिक्षा है कि काम, क्रोध आदि पर नियंत्रण रखो। तो यह नियंत्रण मज़हब ने नहीं रखना है मनुश्यों ने रखना है। हिंसा फैलने का कारण मज़हब नहीं, मज़हब को अपनाने वाले मनुश्यों में उत्पन्न काम, क्रोध, लोभ आदि षत्रुओं का है। प्रत्येक मज़हब में वही पूजनीय हुआ है जिसने इन षत्रुओं पर साधना द्वारा काबू पाया है। अतः हिंसा फैलाने में मज़हब को दोश नहीं दिया जा सकता, दोश उन मनुश्यों का है जो मज़हबी तो हैं परन्तु मज़हब की षिक्षा को आचरण में नहीं लाए। वैसे तो विकार अनेक प्रकार के हैं परन्तु काम, क्रोध और लोभ ये तीन विकार मुख्य रूप से कहे गए हैं। आज धर्म की आड़ में प्रायः तीनों विकारों की बाढ़ सी आ गई है जो मनुश्य को एक सूत्र में बँधने नहीं दे रही है।
यहाँ वेद एवं षास्त्रों पर आधारित व्यासमुनि कृत महाभारत ग्रन्थ से निम्नलिखित कुछ उपदेष लिखे जा रहे हैं जो सभी धार्मिक पुस्तकों में भी विधमान हैं। विचार हमें यह करना है कि क्या यह उपदेष/दिव्य गुण हमारे आचरण में हैं अथवा केवल पुस्तकों में ही पढ़कर और सुनकर हम उन्हें वहीं छोड़ आते हैं। यदि यह गुण आचरण में हो तो फिर तो मनुश्य में बुराई, हिंसा आदि कोई भी दोश कदापि उत्पन्न नहीं हो सकता और इन्सानियत सदा जीवित रहेगी। वेद एवं महाभारत ग्रन्थ से कुछ उपदेष अवलोकन करें; जो पिछले युगों की भांति वर्तमान काल में भी मनुश्यों के आचरण में आने चाहिएः-

माँस की उत्पत्ति वीर्य से होती है अतः माँस भक्षण में महान् दोश है और माँस न खाना पुण्य बताया गया है।

जो पहले माँस खाने के पश्चात् उसे छोड़ देता है, उसे भी बड़े भारी धर्म की प्राप्ति होती है, क्योंकि वह पाप से निवृत्त हो गया है। (अतः माँस भक्षण त्यागना पाप से निवृत्त होने का सरल उपाय है।)

अहिंसा परम धर्म है।
अहिंसा परम संयम है।
अहिंसा परम दान है।
अहिंसा परम तप है।
अहिंसा परम यज्ञ है।
जो हिंसा नहीं करता, उसका तप कभी नश्ट नहीं होता।
(भाव है कि हिंसा करने वाले का तप, दान, पुण्य, ऊँचे-ऊँचे पद, नेतागिरी इत्यादि सब कर्म व्यर्थ हो जाते हैं।)

महाभारत के षांतिपर्व में व्यासमुनि कहते हैं कि मनुश्य किसी के प्रति अहंकार अथवा घमण्ड प्रकट न करे। (अन्यथा रावण और कंस आदि की तरह तुम्हें भी यह अवगुण ले डूबेंगे।)
‘‘क्रोध्यमानः प्रियं ब्रूयात्’’
यदि कोई क्रोध भी करे तो
उससे प्रिय वचन ही बोलें।

पुनः कहा यदि कोई गाली दे, तो भी उसके प्रति कल्याणकारी वचन ही बोलें। (परन्तु दुःख की बात यही है कि मनुश्य ईंट का जवाब पत्थर से देकर समाज में कटुता, नफरत और हिंसा आदि दोश फैलाने से नहीं चूकते। यह कदम बड़प्पन की निषानी नहीं, अपितु निन्दनीय है।)

काम संकल्प (इच्छा) से उत्पन्न होता है। काम का सेवन करने से वह बढ़ता है और जब मनुश्य उससे विरक्त हो जाता है त बवह तत्काल नश्ट हो जाता है।
क्रोध लोभ से उत्पन्न होता है। दूसरों के दोश देखने से बढ़ता है, क्षमा करने से स्थिर हो जाता है और क्षमा से ही निवृत्त हो जाता है।

‘‘परासुता क्रोधलोभादभ्यासाच्च प्रवर्तते’’
अर्थात् दूसरों के वध की इच्छा क्रोध, लोभ और अभ्यास के कारण उत्पन्न होती है। समस्त प्राणियों के प्रति दया और वैराग्य होने से उसकी निवृत्ति हो जाती है। (प्रायः मनुश्य और नेताओं के भाशण सुनकर, उनका मुख देखकर तो ऐसा नहीं लगता कि उनका क्रोध और लोभ षान्त हो जाएगा क्योंकि दलगत, जातिवाद और छींटाकषी की राजनीति में स्वतः ही क्रोध और लोभ की झलक दिखाई देती है। क्रोध का रूप ईंट का जवाब पत्थर से है और लोभ वोट और कुर्सी हथियाने का है। इससे जब दूर हो जाएँगे तो देष स्वतः ही उन्नति करेगा।)

अज्ञान के कारण से लोभ उत्पन्न होता है।
वेद एवं महाभारत में कहे ऊपर के उपदेष मनुश्य द्वारा जीवन में ग्रहण करने के लिए दिए गए है परन्तु आज यही आष्चर्य है कि चाहे मज़हब हो अथवा मज़हब से परे कई साधु-सन्तों के वेद-विरूद्ध बनाए मार्ग हों, प्रायः सभी में यह काम, क्रोध, लोभ आदि अवगुण विद्यमान दिखाई देते हैं। यह आष्चर्य नहीं तो और क्या है। इसमें मज़हब का दोश कहाँ? यह तो मज़हब को अपनाने वाले और मज़हब से परे रहने वाले मनुश्यों का दोश है। इन्हीं दोशों के कारण ही तो आज मनुश्यों, पशु-पक्षियों आदि सभी की हिंसा की जा रही है।

एक मज़हब वाले को यदि कोई हानि अन्य मज़हब वाला पहुँचाता है तो क्रोध युक्त होकर बदला लेने की भावना तुरन्त जाग उठती है। वहाँ प्रेम, क्षमा आदि धारण करके उस मुद्दे को षान्त करने की धारण उत्पन्न होती नज़र नहीं आती और अचानक हिंसा भड़क उठती है तथा कहीं-कहीं तो भूमि रक्तरंजित हो जाती है।

जब मनुश्य को काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि षत्रुओं पर विजय प्राप्त नहीं है तब तो मिरज़ा गालिब के षेर को यहाँ कहने की अतिषयोक्ति न होगी कि-
बस के दुष्वार है हर काम का आसाँ होना,
आदमी को भी मयस्सर नहीं इन्साँ होना।

वस्तुतः यह बात ईष्वर ने यजुर्वेद 40/3 में भी समझाई है कि जब आदमी जन्म लेता है तो वह आदमी ही होता है। जब वह धार्मिक षुभ कर्म करता है तो वह देवता कहलाता है और जब वह धर्म के मार्ग से भटक जाता है और काम, क्रोध, लोभ आदि में फंसकर पाप कर्म करता है तो उसे राक्षस कहते हैं, अर्थात् जन्म आदमी का लेकर आया था पर उसे आदमी होना भी नसीब न हुआ, विपरीत में पापयुक्त होकर राक्षस बन गया। सारांष यह है कि आज मानवता के टुकड़े होते जा रहे हैं। अतः यदि हम मानवता का कल्याण चाहते हैं और इसे एक सूत्र में बाँधना चाहते हैं तो जैसा ऊपर कहा, सभी मनुश्यों के धार्मिक गुरुओं को बैठकर, प्रेमपूर्वक तर्क-संवाद-विचार-विमर्ष करके आपस में भाईचारा और सौहार्द का वातावरण बनाने का मार्ग ढूँढना होगा।

स्वामी रामस्वरूपजी योगाचार्य
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