स्वामी राम स्वरूप जी, योगाचार्य, वेद मंदिर (योल) (www.vedmandir.com)

ओ३म् उत स्वया तन्वा३ सं वेद तत्कदान्वंतर्वरुणे भुवानि ।

किं मे हव्यमहृणानो जुषेत कदा मृळीकं सुमना अभि ख्यम् ॥ ऋग्वेद (७/८६/२)

मंत्र में परमेश्वर की उपासना का प्रकार का वर्णन किया गया है।

(उत) अथवा (स्वया तन्वा) अपने शरीर से (सम्) अच्छी प्रकार (तत्) उस उपासना करने योग्य परमवेश्वर के साथ (वेद) आलाप करूँ (कदा) कब (नु) निश्चय करके (वरुण अन्तः) उस उपास्य देव के स्वरूप में (भुवानि) प्रवेश करूँगा। (किम्) क्या परमात्मा (मे) मेरी (हव्यम्) उपासना रूप भेंट को (अहृणानः) प्रसन्न होकर (जुषेत) स्वीकार करेंगे, (कदा) कब (मृळीकं) उस सर्व सुख दाता को (सुमनाः) शुद्ध मन से (अभि, ख्यम्) सब ओर से ज्ञानगोचर करूँगा।

उपासना करने वाला पुरुष जब वेद मार्ग पर चलकर तथा योग-साधना, नाम-सिमरन, यज्ञ इत्यादि द्वारा ईश्वर की उपासना करता है तब उस साधक को अपने अंदर भिन्न-भिन्न प्रकार की अनुभूतियां होती हैं। कहीं-कहीं पर स्वयं परमेश्वर की शुद्ध वाणी का उसे आभास होता है। भाव यह है कि ईश्वर नहीं बोलता अपितु वेद वाणी के अर्थ इत्यादि। जब उपासक ऐसा अनुभव करता है तो प्रार्थना करता है कि हे परमेश्वर मैं पवित्र मन से आपके ज्ञान अर्थात् वेद विद्या में निमग्न रहूँ। आपके अतिरिक्त और किसी को ना ध्याऊँ । अतः हम वेदों में वर्णित परमेश्वर की उपासना करें, अन्य की नहीं। यह मंत्र एवं चारों वेद यह स्पष्ट उपदेश देते हैं कि ईश्वर की पूजा वेदों में कहे ज्ञान के अनुसार करनी चाहिए।

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